
नर्मदापुरम / अदुःख नवमी (जिसे बोलचाल में ‘दुःख नवमी’ भी कहा जाता है) हिंदू धर्म का एक अत्यंत कल्याणकारी व्रत है। यह मुख्य रूप से दुखों के नाश और सुख-समृद्धि की प्राप्ति के लिए किया जाता है। इस व्रत से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें इस प्रकार हैं।
तिथि और समय
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यह व्रत हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाया जाता है।
मुख्य देवी और महत्व
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माता गौरी की पूजा: इस व्रत की मुख्य आराध्य देवी माता पार्वती (गौरी) हैं। कुछ क्षेत्रों में इसे माता दुर्गा के अष्टभुजी रूप से जोड़कर भी पूजा जाता है।
दुखों से मुक्ति: ‘अदुःख’ शब्द का अर्थ ही है “जहां कोई दुःख न हो”। मान्यता है कि इस दिन पूरी श्रद्धा से पूजा करने से जीवन के सभी कष्ट और दरिद्रता दूर होती है।
परिवार की भलाई: महिलाएं इस व्रत को अखंड सौभाग्य, संतान सुख और अपने परिवार को हर प्रकार के संकट से बचाने के लिए रखती हैं।
पूजा विधि (संक्षिप्त)
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स्थापना: पूजा स्थान पर एक साफ कलश स्थापित किया जाता है और उसके ऊपर पूर्णपात्र (अनाज से भरा बर्तन) रखकर माता गौरी का ध्यान किया जाता है।
श्रृंगार और भोग: माता को लाल चुनरी, फूल, कुमकुम, हल्दी और श्रृंगार की सामग्री अर्पित की जाती है। उन्हें विशेष नैवेद्य (भोग) लगाया जाता है।
अलक्ष्मी विसर्जन: कुछ क्षेत्रों (जैसे महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों) में इस दिन घर की साफ-सफाई करके दरिद्रता या अलक्ष्मी को घर से बाहर निकालने की भी परंपरा है।
दान: पूजा के बाद सुहागिन महिलाओं या जरूरतमंदों को भोजन और वस्त्र दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है।(संकलन – प्रीति चौहान)

