विद्वानों ने धर्मसिंधु के आधार पर लिया निर्णय
दयाराम फौजदार रिपोर्टर नर्मदापुरम।
संवत् 2082 की फाल्गुन पूर्णिमा इस बार केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि ज्योतिषीय गणनाओं की एक बड़ी परीक्षा लेकर आ रही है। आगामी वर्ष 2026 में खगोल विज्ञान और धर्मशास्त्रों के अद्भुत टकराव के बीच यह तय हुआ है कि होलिका दहन 2 मार्च को ही संपन्न होगा। विद्वानों ने यह निर्णय इसलिए लिया है क्योंकि अगले दिन यानी 3 मार्च को आकाश में होने वाली हलचल उत्सव के आड़े आ रही है।
क्यों बदला गया परंपरा का गणित?
सामान्यतः पूर्णिमा की तिथि और अगले दिन की स्थिति देखकर दहन का मुहूर्त तय होता है, लेकिन इस बार 3 मार्च को ‘ग्रस्तोदित चंद्रग्रहण’ का साया है। शास्त्रों के अनुसार, ग्रहण के सूतक और वेध के दौरान अग्नि प्रज्वलित करना निषिद्ध है।
‘धर्मसिंधु’ के सिद्धांतों का हवाला देते हुए ज्योतिषाचार्यों ने स्पष्ट किया है कि यदि अगले दिन ग्रहण का प्रभाव हो, तो पूर्व दिन ही होलिका प्रज्वलित करना मंगलकारी होता है।
3 मार्च को प्रदोष काल (शाम का समय) से पहले ही पूर्णिमा समाप्त हो जाएगी, जिससे उस दिन दहन का कोई शास्त्रीय आधार नहीं बचता।
भद्रा की चुनौती और ‘प्रदोष काल’ का समाधान
2 मार्च को शाम से ही भद्रा का प्रवेश हो रहा है, जो अगले दिन सुबह तक चलेगी। ऐसे में यह सवाल उठा कि क्या भद्रा में होली जल सकती है? विशेषज्ञों ने इसका समाधान निकालते हुए बताया है कि भद्रा मुख का त्याग: भद्रा के शुरुआती कठिन समय (मुख काल) को छोड़कर पूजन किया जा सकता है।
विजय मुहूर्त सूर्यास्त के बाद के लगभग 144 मिनट (2 घंटे 24 मिनट) का समय सबसे पवित्र माना गया है। इस ‘प्रदोष वेला’ में भद्रा का दोष मान्य नहीं होगा। इस वर्ष भक्तों को मुहूर्त की शुद्धता का विशेष ध्यान रखना होगा, क्योंकि ग्रहण की उपस्थिति के कारण सूतक काल से पूर्व ही सभी धार्मिक अनुष्ठान पूर्ण कर लेना जनहित और राष्ट्रहित में कल्याणकारी माना जा रहा है।

