
नर्मदापुरम / रमा एकादशी कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी है। यह दीपावली से ठीक चार दिन पहले आती है। इस व्रत में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। रमा एकादशी की तिथि 4 नवंबर 2026 को सुबह 11 बजकर 3 मिनट पर शुरू होगी। इसका समापन 5 नवंबर को सुबह 10 बजकर 35 मिनट पर होगा। उदया तिथि के आधार पर 5 नवंबर को रमा एकादशी का व्रत रखा जाएगा.
तिथि….
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• व्रत की तिथि: 5 नवंबर 2026, गुरुवार
• पारण का समय (व्रत तोड़ने का समय): 6 नवंबर 2026, शुक्रवार (द्वादशी तिथि पर)
रमा एकादशी का महत्व….
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• पापों का नाश: पद्म पुराण और ब्रह्म-वैवर्त पुराण के अनुसार, रमा एकादशी का व्रत रखने से बड़े-बड़े पाप (जैसे ब्रह्महत्या आदि) नष्ट हो जाते हैं।
• सुख-समृद्धि और लक्ष्मी कृपा: इस दिन विधि-विधान से पूजा और तुलसी को दीपदान करने से घर में मां लक्ष्मी का स्थायी वास होता है और आर्थिक तंगी दूर होती है।
• मोक्ष की प्राप्ति: यह व्रत व्यक्ति को वासुदेव/विष्णु लोक की प्राप्ति कराता है और इसका पुण्य बड़े-बड़े यज्ञों (जैसे वाजपेय यज्ञ) के समान माना गया है।
रमा एकादशी की कथा….
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रमा एकादशी की कथा राजा मुचुकुंद और उनकी कन्या चंद्रभागा तथा चंद्रभागा के पति शोभन से जुड़ी है:
• शोभन का व्रत रखना: चंद्रभागा के पति शोभन एक बार अपने ससुर (राजा मुचुकुंद) के यहाँ आए थे। उन दिनों कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की रमा एकादशी आई। चंद्रभागा के नगर में एकादशी का व्रत करना अनिवार्य था, इसलिए शोभन ने भी कमजोरी और स्वास्थ्य ठीक न होने के बावजूद श्रद्धापूर्वक यह व्रत रखा।
• शोभन की मृत्यु: भूख और थकान के कारण रात्रि जागरण के दौरान शोभन की मृत्यु हो गई।
• दिव्य नगर की प्राप्ति: रमा एकादशी के व्रत के प्रभाव से शोभन को मृत्यु के पश्चात मंदराचल पर्वत पर सोने और रत्नों से बना एक अत्यंत सुंदर व दिव्य नगर प्राप्त हुआ। वह वहाँ का राजा तो बने, लेकिन उनका वह राज्य अस्थाई (अध्रुव) था।
• नगर का स्थायी होना: एक बार ऋषि वामदेव उस नगर में पहुँचे और शोभन ने उन्हें अपनी पहचान बताई। तब ऋषि वामदेव ने चंद्रभागा को बुलाकर उसके बचपन से (8 वर्ष की आयु से) किए गए एकादशी व्रतों का पुण्य शोभन को अर्पित करने को कहा। चंद्रभागा के व्रतों के पुण्यबल से वह दिव्य नगर स्थायी (ध्रुव) हो गया और दोनों आनंदपूर्वक रहने लगे।(संकलन – प्रीति चौहान)

