


नर्मदापुरम / विधिक साक्षरता शिविर का उद्देश्य केवल कानून की जानकारी देना ही नहीं है बल्कि समाज के प्रत्येक वर्ग में न्याय व्यवस्था के प्रति विश्वास और जागरूकता पैदा करना भी है। इसी उद्देश्य को एक अनूठा और भावनात्मक आयाम उस समय मिला जब राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के निर्देश पर “सुरक्षित बचपन अभियान” के तहत आयोजित विधिक साक्षरता शिविर में उपस्थित बच्चों ने न्यायालय की कार्यवाही को प्रत्यक्ष रूप से देखने की इच्छा व्यक्त की थी।
बच्चों की इस सहज जिज्ञासा को केवल एक इच्छा न मानकर उनके सीखने और समझने के अवसर के रूप में स्वीकार करते हुए जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के द्वारा सेमीरिटन स्कूल के 9वी से 12 वी तक के बच्चों को जिला एवं सत्र न्यायालय का भ्रमण कराया गया। इस दौरान श्रीमती तृप्ति शर्मा की व्यक्तित्व एक न्यायाधीश की औपचारिक भूमिका से आगे बढ़कर एक स्नेहिल अभिभावक के रूप में सामने आया। उन्होंने बच्चों के बीच सहजता से संवाद किया उनकी छोटी-छोटी जिज्ञासाओं को भी गंभीरता और धैर्य से सुना तथा सरल भाषा में उनके प्रश्नों का उत्तर दिया।
उनके व्यवहार में न पद की औपचारिकता थी न संवाद में कोई दूरी बल्कि बच्चों के प्रति एक मां जैसी ममता धैर्य और अपनत्व झलक रहा था। उन्होंने बच्चों को न्यायालय की कार्यप्रणाली और न्यायिक प्रक्रिया से परिचित कराते हुए यह एहसास कराया कि न्यायालय केवल विवादों के निराकरण का स्थान नहीं बल्कि प्रत्येक नागरिक के अधिकारों सुरक्षा और सम्मान का संरक्षक भी है।
यह दृश्य अपने आप में विशेष था। जिस न्यायालय को बच्चे प्रायः गंभीर वातावरण वकीलों की बहस और न्यायाधीश की कुर्सी के रूप में देखते या कल्पना करते हैं उसी न्यायालय में उन्हें संवेदनशीलता, अपनत्व और वात्सल्य का एक नया स्वरूप देखने को मिला। श्रीमती शर्मा के इस आत्मीय व्यवहार ने बच्चों के मन से न्यायालय के प्रति संकोच दूर कर वहां विश्वास और अपनत्व का भाव पैदा किया।
श्रीमती शर्मा ने बच्चों के प्रति बढ़ते यौन अपराधों तथा साइबर अपराधों के प्रति जागरूक करते हुए यह संदेश दिया गया कि बच्चों की सुरक्षा केवल कानून और प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं बल्कि परिवार और समाज का भी समान दायित्व है। बच्चों को अच्छे और बुरे स्पर्श का अंतर समझाना किसी भी व्यक्ति के अनुचित व्यवहार का विरोध करने तथा ऐसी बात अपने माता-पिता या विश्वसनीय व्यक्ति को बिना डर के बताने के लिए प्रोत्साहित करना आवश्यक है।
डिजिटल युग में बच्चों को मोबाइल और इंटरनेट के सुरक्षित उपयोग के प्रति जागरूक करना भी जरूरी है अनजान व्यक्तियों से ऑनलाइन बातचीत, अपनी फोटो अथवा निजी जानकारी साझा करने अनजान लिंक खोलने तथा ऑनलाइन किसी के बहकावे में आने से बचने की समझ विकसित की जानी चाहिए यदि कोई व्यक्ति ऑनलाइन परेशान करे अनुचित संदेश भेजे या निजी फोटो अथवा वीडियो मांगे तो बच्चे घबराएं नहीं ऐसी बात छिपाएं नहीं और तत्काल अपने अभिभावकों को बताएं।
इस संबंध में परिवार की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डालते हुए बताया कि बच्चों के साथ विश्वास और संवाद का रिश्ता बनाए रखना है ताकि वे अपनी हर परेशानी बिना किसी भय या संकोच के साझा कर सकें। समाज का दायित्व है कि बच्चों के प्रति किसी भी अनुचित व्यवहार या शोषण की अनदेखी न करे और समय रहते उचित प्राधिकारी को सूचना दे। सुरक्षित बचपन अभियान के तहत जानकारी देते हुये बताया कि बच्चों का बचपन केवल उनके माता-पिता की नहीं पूरे समाज की अमानत है। उनकी मुस्कान सुरक्षित रहे उनके सपने किसी अपराध या नशे की भेंट न चढ़ें और उनका भविष्य भयमुक्त हो यही हम सभी का सामूहिक संकल्प होना चाहिए।
इस पहल ने बच्चों के मन में न्यायालय के प्रति विश्वास और सम्मान की भावना को सुदृढ़ करने के साथ उन्हें अपने अधिकारों कर्तव्यों व्यक्तिगत सुरक्षा और नशामुक्त जीवन के महत्व से भी परिचित कराया। न्यायालय की दीवारों के भीतर उस दिन बच्चों ने केवल न्यायिक प्रक्रिया नहीं देखी बल्कि न्याय के साथ जुड़ी ममता, संवेदना और मानवीयता को भी महसूस किया। उनके लिए यह केवल न्यायालय भ्रमण नहीं, बल्कि जीवनभर याद रहने वाला एक आत्मीय अनुभव बन गया।
इस अवसर पर विशेष न्यायाधीश एनडीपीएस एक्ट दिनेश कुमार नोटिया ने उन्हें बताया कि निःशुल्क विधिक सहायता के माध्यम से जरूरतमंद व्यक्ति भी न्याय प्राप्त कर सकते हैं, सचिव जिला विधिक सेवा प्राधिकरण दीपक चौधरी ने बच्चों को अधिकारो के प्रति जागरूक करते हुये, राष्टीय विधिक सेवा प्राधिकरण एवं राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की विभिन्न योजनाओ के बारे में विस्तारपूर्वक समझाया, अध्यक्ष जिला अधिवक्ता संघ सुरेन्द्र सिंह राजपूत ने विभिन्न कानूनो की जानकारी दी। इस दौरान विशेष न्यायाधीश मनोज कुमार, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट फिरोज अख्तर एवं जिला विधिक सहायता अधिकारी अभय सिंह सहित समस्त न्यायाधीश उपस्थित थे।

