
नर्मदापुरम / ग्राम पंचायत डोंगरवाडा में सरपंच पद को लेकर जारी विवाद अब एक नए विधिक मोड़ पर पहुँच गया है। उच्च न्यायालय के आदेश के परिपालन में पूर्व स्थानापन्न सरपंच कैलाश दायमा ने कलेक्टर के समक्ष विधिवत नया अभ्यावेदन प्रस्तुत कर दिया है। उच्च न्यायालय द्वारा याचिका को निस्तारित करते हुए याचिकाकर्ता को 15 दिनों के भीतर कलेक्टर के समक्ष नए सिरे से अभ्यावेदन प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता दी गई थी, जिसके तहत समय-सीमा का पालन करते हुए यह कदम उठाया गया है।
यह है पूरा घटनाक्रम…
16 मार्च 2026 को कलेक्टर द्वारा तत्कालीन सरपंच माखन लाल कीर के विरुद्ध 28 आपराधिक प्रकरण दर्ज होने के आधार पर 1 वर्ष के लिए जिला बदर का आदेश पारित किया गया था। कैलाश दायमा स्थानापन्न सरपंच बने थे। मूल सरपंच के जिला बदर होने के उपरांत रिक्त हुए पद पर मुख्य कार्यपालन अधिकारी एवं ग्राम पंचायत सचिव की विधिक प्रक्रिया के तहत 4 मई 2026 को बहुमत एवं चुनाव प्रक्रिया द्वारा कैलाश को ग्राम पंचायत डोंगर वाड़ा का सरपंच चुना गया था। कमिश्नर के आदेश से सजा कम, पुलिस हाजिरी की शर्त विभागीय आयुक्त द्वारा 2 जून 2026 को आदेश पारित कर माखन लाल कीर की जिला बदर की अवधि को ढाई माह बाद शिथिल करते हुए प्रत्येक सप्ताह 1 वर्ष तक संबंधित थाने में उपस्थिति दर्ज कराने की शर्त लगाई गई थी।
थाने में नियमित उपस्थिति की अनिवार्यता और 28 आपराधिक मामलों के लंबित रहने के बावजूद, मुख्य कार्यपालन अधिकारी द्वारा 7 जुलाई 2026 को बिना किसी विधिक सुनवाई या कारण बताओ नोटिस के कैलाश दायमा को पद से पृथक कर माखन लाल कीर को पुनः सरपंच पद पर बहाल कर दिया गया। हाईकोर्ट का दखल और विधिक स्थिति प्रशासनिक निर्णय से व्यथित होकर कैलाश ने उच्च न्यायालय की शरण ली थी । उच्च न्यायालय ने मामले के गुण-दोष पर कोई अंतिम टिप्पणी किए बिना याचिका को इस निर्देश के साथ निस्तारित किया कि यदि याचिकाकर्ता 15 दिनों के भीतर कलेक्टर के समक्ष नया अभ्यावेदन प्रस्तुत करता है, तो सक्षम प्राधिकारी उस पर विचार कर विधि अनुसार निर्णय लें।
अब कलेक्टर के निर्णय पर निगाहें…..
कैलाश ने उच्च न्यायालय के 3 सितंबर के आदेश के परिपालन में तत्काल कार्रवाई करते हुए 8 सितंबर को कलेक्टर कार्यालय में अपना अभ्यावेदन सभी संलग्नकों सहित विधिवत जमा कर पावती प्राप्त कर ली है। अब नज़रें जिला प्रशासन पर टिकी हैं कि क्या विधि-सम्मत प्रक्रिया और लोक-पद की शुचिता को ध्यान में रखते हुए 7 जुलाई के विवादित आदेश को निरस्त कर याचिकाकर्ता को पुनः पदभार सौंपा जाता है या नहीं।

