
नर्मदापुरम / नई दिल्ली / राज्यसभा में सांसद माया नारोलिया ने विशेष उल्लेख (स्पेशल मेंशन) के माध्यम से जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के बीच कृषि और जल प्रबंधन को लेकर दीर्घकालिक रणनीति तैयार करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की चुनौती नहीं, बल्कि वर्तमान की गंभीर समस्या बन चुका है। अनियमित वर्षा, बढ़ता तापमान, सूखा, अतिवृष्टि और बदलते मौसम चक्र का सबसे अधिक असर किसानों पर पड़ रहा है।
सांसद माया नारोलिया ने कहा कि केवल प्राकृतिक आपदाओं के बाद राहत उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए दूरदर्शी सोच के साथ अभी से ऐसी नीतियां तैयार करनी होंगी, जो आने वाले दशकों में किसानों और जल संसाधनों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से बचाने में सक्षम हों।
जल संरक्षण को जन-आंदोलन बनाने पर जोर…
उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश नर्मदा, चंबल, सोन और ताप्ती जैसी महत्वपूर्ण नदियों तथा समृद्ध कृषि परंपरा वाला राज्य है। ऐसे में प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता के साथ-साथ उनके संरक्षण, संवर्धन और विवेकपूर्ण उपयोग पर भी विशेष ध्यान देने की जरूरत है।
नारोलिया ने वर्षा जल संचयन, तालाबों के पुनर्जीवन, सूक्ष्म सिंचाई, जलग्रहण क्षेत्र के विकास और भूजल पुनर्भरण को व्यापक स्तर पर बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई।
उन्होंने कहा कि जल संरक्षण को जन-आंदोलन का स्वरूप दिया जाना चाहिए। पारंपरिक जल प्रबंधन प्रणालियों को आधुनिक विज्ञान और तकनीक से जोड़कर जल संरक्षण की दिशा में अधिक प्रभावी परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।
25 से 50 वर्षों की दीर्घकालिक रणनीति की मांग…
राज्यसभा सांसद ने राज्य सरकार से अगले 25 से 50 वर्षों को ध्यान में रखते हुए कृषि एवं जल प्रबंधन की समग्र और दूरदर्शी रणनीति तैयार करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि इस रणनीति में मिट्टी के स्वास्थ्य की निरंतर निगरानी, जलवायु-अनुकूल बीजों का विकास, मौसम आधारित वास्तविक समय की कृषि सलाह और जल के दक्ष उपयोग जैसे विषयों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
उन्होंने किसानों की जलवायु परिवर्तन के अनुरूप ढलने की क्षमता बढ़ाने पर भी विशेष ध्यान देने की आवश्यकता बताई। उनके अनुसार, कृषि क्षेत्र को बदलती जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप तैयार करना समय की महत्वपूर्ण मांग है।

