
नर्मदापुरम / कानून की चौखट पर जब इंसाफ का तराजू हिलता है, तो उसकी गूँज बहुत दूर तक जाती है। एक ऐसे ही दिल दहला देने वाले भीड़ हिंसा (मॉब लिंचिंग) के मामले में नर्मदापुरम की माननीय न्यायाधीश सिवनी मालवा तबस्सुम खान की अदालत ने न्याय की एक नई मिसाल पेश की है। न्यायाधीश ने मामले की तह तक जाते हुए और सभी वैज्ञानिक व चश्मदीद सबूतों को खंगालने के बाद, हिंसा पर उतारू भीड़ का हिस्सा रहे सभी 14 आरोपियों को दोषी पाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि कानून हाथ में लेने वालों के लिए समाज में कोई जगह नहीं है और सभी दोषियों को आजीवन कारावास (उम्रकैद) की कठोर सजा सुनाकर जेल भेज दिया। इस ऐतिहासिक फैसले के आते ही न्याय के मंदिर के बाहर का नजारा अचानक बदल गया। जो लोग कल तक खुद को कानून से ऊपर समझ रहे थे, उनके परिजनों का सब्र टूट गया और अदालत परिसर एक रणक्षेत्र में तब्दील हो गया।
पर्दाफाश…
‘गौसेवा’ के नाम पर कानून को चुनौती इस पूरे घटनाक्रम की जड़ें कुछ साल पुरानी उस खौफनाक रात से जुड़ी हैं, जब नाजिर अहमद नामक व्यक्ति को एक हिंसक भीड़ ने घेर लिया था। तफ्तीश में यह बात सामने आई कि हमलावरों ने खुद को कानून से ऊपर मान लिया था।
अदालत में बचाव पक्ष ने दलील दी कि ये युवक महज ‘गौसेवा’ की भावना से प्रेरित होकर वहां जमा हुए थे। लेकिन माननीय न्यायाधीश तबस्सुम रवान की पैनी नजरों और अदालत ने इस मुखौटे के पीछे छिपी क्रूरता को पहचान लिया। कोर्ट ने साफ किया कि किसी भी भावना या सेवा के नाम पर किसी नागरिक की जान लेने की छूट नहीं दी जा सकती। तीन साल तक चली लंबी कानूनी लड़ाई, गहन गवाहियों और तकनीकी साक्ष्यों के बाद आखिरकार न्याय की जीत हुई।
हाई-वोल्टेज ड्रामा….
जब दोषियों को ले जा रहे पुलिस वाहन के आगे लेट गई भीड़ जैसे ही अदालत के बंद कमरे से ‘उम्रकैद’ की सजा की गूँज बाहर आई, न्यायालय परिसर में तनाव की स्थिति निर्मित हो गई। दोषियों के समर्थक और रिश्तेदार भारी संख्या में जमा हो चुके थे।
खोजी नजरों से देखें तो यह हंगामा स्वतः स्फूर्त नहीं, बल्कि प्रशासन पर दबाव बनाने का आखिरी पैंतरा नजर आ रहा था, सुरक्षा घेरे को तोड़ने की कोशिश जब पुलिस बल ने सभी 14 दोषियों को कैदी वाहन में बैठाना शुरू किया, तो परिजनों ने रोते-बिलखते हुए गाड़ियों का रास्ता रोक लिया। सड़क पर प्रदर्शन कानून को आखिरी चुनौती देते हुए कुछ लोग पुलिस की गाड़ियों के पहियों के आगे लेट गए तीखी झड़प पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच जमकर धक्का-मुक्की हुई। स्थिति हाथ से न निकले, इसके लिए प्रशासन को अतिरिक्त बल का प्रयोग करना पड़ा और काफी जद्दोजहद के बाद सभी दोषियों को जेल की सलाखों के पीछे सुरक्षित पहुंचाया गया। सलाखों के पीछे पहुंचे भीड़ के वो 14 चेहरे माननीय न्यायाधीश तबस्सुम रवान की अदालत ने जिन अपराधियों के हिंसक कृत्य पर मुहर लगाते हुए उन्हें समाज से अलग उम्रकैद की सजा दी है, उनकी पूरी सूची इस प्रकार है।
दोषी का नाम उम्र (वर्ष), कानूनी स्थिति….
दीपक उर्फ बाबा केवट 38 दोषी (उम्रकैद), अज्जू उर्फ अजय राठौर 36 दोषी (उम्रकैद), प्रकाश कौशल 33 दोषी (उम्रकैद), पवन बाथव 31 दोषी (उम्रकैद), अमर उर्फ भोला बाथव 38, दोषी (उम्रकैद), कन्हैया बाथव 32 दोषी (उम्रकैद), बब्लू उर्फ अनुज रघुवंशी 24 दोषी (उम्रकैद), राजू उर्फ राजेन्द्र कौशल 39 दोषी (उम्रकैद), आकाश उर्फ पिंटोली बाथव 31 दोषी (उम्रकैद), गौरव यादव 24 दोषी (उम्रकैद), आकाश सराठे 33 दोषी (उम्रकैद), चेतन मराठा 23 दोषी (उम्रकैद), देवेन्द्र उर्फ छोटू कोरी 22 दोषी (उम्रकैद), संदीप उर्फ राजा कौशल 26 दोषी (उम्रकैद)।
यह फैसला केवल 14 लोगों को सजा देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के हर उस नागरिक के लिए एक कड़ा संदेश है जो भीड़ की आड़ में छिपकर अपराध को अंजाम देते हैं। कानून ने यह साबित कर दिया है कि भीड़ का कोई चेहरा भले न हो, लेकिन जब उसकी पहचान होती है, तो न्याय का डंडा बेहद बेरहमी से चलता है।

