
नर्मदापुरम / ग्राम निटाया में करोड़ों रुपए मूल्य की बेशकीमती शासकीय आबादी भूमि को ‘स्वामित्व योजना’ के नियमों को ताक पर रखकर एक रसूखदार व्यक्ति (वर्तमान सरपंच के पुत्र) के नाम करने का एक बड़ा खेल शुरू हो गया है। इस पूरे मामले में स्थानीय तहसीलदार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं, जो खुद को बचाने और आर्थिक लाभ कमाने के चक्कर में नियमों के विरुद्ध जाकर ग्राम स्तरीय समिति के कंधे का इस्तेमाल कर रहे हैं। तरौंदाढाना का संपन्न किसान, निटाया में बता रहा खुद को निवासी मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि आवेदक प्रताप ठाकुर ने अपने आवेदन में स्वयं को ग्राम निटाया का निवासी बताया है। जबकि धरातल की सच्चाई यह है कि आवेदक न तो निटाया का निवासी है और न ही वहां का किसान। वह मूल रूप से पड़ोसी ग्राम तरौंदाढाना का एक संपन्न किसान है, जिसका मकान, जमीन और पूरा रसूख वहीं केंद्रित है। नियमानुसार, गलत जानकारी देने के कारण यह आवेदन पहली नज़र में ही निरस्त हो जाना चाहिए था।
नियमों की धज्जियां:……
स्वामित्व योजना में ‘खलिहान’ के लिए आबादी भूमि का प्रावधान ही नहीं आवेदक ने दावे में लिखा है कि विवादित भूमि पर पहले उसका ‘खलिहान’ बनता था। लेकिन ‘स्वामित्व योजना’ के नियमों पर नजर डालें तो पूरे मध्य प्रदेश में इस योजना के अंतर्गत शासकीय आबादी भूमि को किसी निजी व्यक्ति को खलिहान के लिए आवंटित करने का कोई नियम नहीं है। यदि सर्वे के दौरान शासकीय दल और पटवारी ने इस भूमि को सरकारी (शासकीय) दर्ज किया था, तो इसका सीधा मतलब है कि यह भूमि सार्वजनिक हित की है। सवाल यह भी उठता है कि तरौंदाढाना का एक संपन्न किसान अपने गांव को छोड़कर निटाया में नाले के किनारे आकर खलिहान क्यों बनाएगा अपने ही बेटे के आवेदन पर फैसला करेगी ‘सरपंच’ की समिति तहसीलदार द्वारा इस विवादित मामले को जिस ग्राम स्तरीय समिति को सौंपकर निराकरण कराने का प्रयास किया जा रहा है, उसका ढांचा ही निष्पक्षता पर सवाल उठाता है। इस समिति के अध्यक्ष स्वयं वर्तमान सरपंच हैं, और आवेदक उनका सगा बेटा है। समिति के अन्य सदस्य (कोटवार, रोजगार सहायक, सचिव और पटवारी) सरपंच के राजनैतिक और प्रशासनिक रसूख के नीचे दबे हुए हैं। नियम क्या कहता है? प्रशासनिक नियमों के अनुसार, यदि ग्राम स्तरीय समिति स्वयं हितों के टकराव (Conflict of Interest) के कारण विवादित हो जाए, तो मामले का निराकरण तत्काल तहसील स्तरीय समिति को सौंप दिया जाना चाहिए। इसके बावजूद तहसीलदार इस मामले को दबाकर बैठे हैं। चार महीने से क्यों लंबित है मामला? धनबल का आरोप ग्राम में इस योजना का प्रथम प्रकाशन दिसंबर 2025 में हुआ था, जिस पर ग्रामीणों ने जनवरी 2026 में ही लिखित आपत्ति दर्ज करा दी थी। नियमानुसार इसका निराकरण एक महीने के भीतर होना अनिवार्य था। आपत्ति प्रथम दृष्टया ही सही थी, फिर भी तहसीलदार द्वारा इसे अब तक लंबित रखना प्रशासनिक शिथिलता और धनबल के प्रभाव की ओर साफ इशारा करता है।
पर्दे के पीछे का खेल:….
‘बड़े साहब’ का ढाबा प्लान नाम न छापने की शर्त पर ग्रामीणों ने एक बड़ा खुलासा करते हुए बताया कि इस जमीन को हथियाने के पीछे का मुख्य उद्देश्य कृषि कार्य नहीं, बल्कि व्यावसायिक है। कथित तौर पर एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के साथ मिलकर इस मुख्य मार्ग की भूमि पर ‘ढाबा’ खोलने की योजना बनाई जा रही है। स्थानीय स्तर पर लोग इस जगह को अभी से “साहब वाली भूमि” कहकर संबोधित करने लगे हैं। इसके अलावा, आवेदक ने भूमि पर लाखों रुपए की ‘पुरनी’ (मिट्टी/मुरम भराई) कराने का दावा किया है। ग्रामीणों की मांग है कि इस भराई के लिए उपयोग की गई सामग्री के बिल, परिवहन और शासकीय रॉयल्टी (Royalty) के दस्तावेजों की भी जांच हो, ताकि अवैध उत्खनन का सच सामने आ सके। उच्चाधिकारियों से गुहार, सुरक्षित हो सरकारी जमीन इस महाघोटाले की विस्तृत शिकायत ग्रामीणों द्वारा कमिश्नर, जिला कलेक्टर और एसडीएम को साक्ष्यों के साथ भेज दी गई है। अब देखना यह है कि जिले के आला अधिकारी इस स्पष्ट धोखाधड़ी पर क्या रुख अपनाते हैं। क्या नियम और जनहित सर्वोपरि होंगे या फिर रसूखदारों का धनबल भारी पड़ेगा ग्रामीणों की मांग है कि इस करोड़ों की भूमि को किसी निजी हाथों में सौंपने के बजाय, भविष्य में किसी शासकीय भवन (स्कूल, अस्पताल या आंगनवाड़ी) के लिए आरक्षित कर हमेशा के लिए सुरक्षित किया जाए।

