नर्मदापुरम / शासकीय गृहविज्ञान स्नातकोत्तर अग्रणी महाविद्यालय में इको क्लब के माध्यम से इको फ्रेंडली नवाचार कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में विषय विशेषज्ञ के रूप में आनंद पटेल पर्यावरणविद, पर्यावरण शिक्षा एवं संरक्षण समिति भोपाल को आमंत्रित किया गया जिन्होंने महाविद्यालय में इको ब्रिक्स, सीड बॉल एवं बायोएंजाइम निर्माण करने की तकनीक से अवगत कराया एवं छात्राओं को इसका व्यावहारिक अभ्यास भी करवाया गया। महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. श्रीमती कामिनी जैन ने बताया कि इको ब्रिक्स कचरा प्रबंधन, प्रदूषण नियंत्रण और संसाधन संरक्षण का सरल एवं प्रभावी उपाय है। यदि समुदाय स्तर पर इन्हे अपनाया जाये तो यह स्वच्छ और सतत् पर्यावरण की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते है। सीड बॉल हरित विस्तार, जैव विविधता संरक्षण और जलवायु संतुलन का एक सरल और प्रभावी माध्यम है। सामूहिक प्रयासों से यह तकनीक स्वच्छ, हरा भरा और टिकाऊ पर्यावरण बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। महाविद्यालय में बायोएंजाइम के निर्माण की तकनीक भी सिखाई गई जो पौधों में वृद्धि बढ़ाने में सहायक होता है, मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बढ़ाता है और रासायनिक उर्वरकों का एक उपयुक्त विकल्प है। यह कचरा प्रबंधन, प्रदूषण नियंत्रण और टिकाऊ जीवन शैली को बढ़ावा देता है। इसका उपयोग स्वच्छ पर्यावरण और स्वस्थ्य पारिस्थितिक तत्र के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। श्रीमती आनंद पटेल द्वारा ईको ब्रिक्स निर्माण की प्रक्रिया को बताया गया। इको ब्रिक्स बनाने के लिए एक खाली और सूखी प्लास्टिक बोतल ले, घर से निकलने वाला साफ और सूखा प्लास्टिक जैसे चिप्स पैकेट, टॉफी रैपर आदि इकट्ठा करें, प्लास्टिक को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटे एवं लकड़ी की मदद से बोतल में अच्छी तरह दबाकर भरें, बोतल पूरी तरह कड़ी और भारी हो जाए तो इको ब्रिक्स बनकर तैयार हो जाती। सीड बाल बनाने के लिए पौधों के बीज एकत्रित करें मिट्टी एवं गोबरखाद या केंचुआ खाद को सही अनुपात में मिलाएं, बीज डालें और थोड़ा पानी मिलाकर आटा जैसा मिश्रण बनाएं, इसके बाद छोटे-छोटे सीड बॉल बनाएं और इन्हें छाया में एक-दो दिन के लिए सुखाएं। बायोएंजाइम प्राकृतिक रूप से तैयार किया गया तरल पदार्थ होता है जो फल सब्जियों के छिलकों, गुड़ और पानी से बनता है। यह पौधों की वृद्धि और मिट्टी की सेहत के लिए अत्यंत उपयोगी होता है। कार्यशाला की संयोजक डॉ. संगीता अहिरवार ने बताया कि ईको ब्रिक्स, सीड बॉल और जैव उर्वरक का निर्माण पर्यावरण संरक्षण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण एवं उपयोगी है इससे प्लास्टिक कचरे का पुन उपयोग कर सकते है, जिससे वायु प्रदूषण को कम किया जा सकता है, प्राकृतिक संसाधनों की बचत की जा सकती है, रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता में कमी ला सकते हैं। जिससे जल एवं मृदा प्रदूषण को नियंत्रित किया जा सकता है एवं सतत कृषि को बढ़ावा दिया जा सकता है।
ईको क्लब प्रभारी डॉ. रागिनी सिकरवार कार्यशाला के विषय पर प्रकाश डालते हुए बताया कि आज की कार्यशाला महाविद्यालय में पर्यावरण संरक्षण की ओर नवाचार की एक नई पहल है। उन्होंने बताया कि ईको ब्रिक्स प्लास्टिक कचरे से बनी पर्यावरण अनुकूल ईंटे होती है, इन्हें खाली प्लास्टिक बोतलों में साफ और सूखा प्लास्टिक जैसे रैपर पॉलिथीन भरकर तैयार किया जाता है। यह प्लास्टिक कचरे को दोबारा उपयोग में लाने का सरल एवं प्रभावित तरीका है। सीड बॉल बनाने का मुख्य उद्देश्य हरियाली बढ़ाना, बीजों को पक्षियों, कीड़ों और तेज धूप से सुरक्षित रखना, कम पानी में पौधारोपण करना एवं सामुदायिक भागीदारी बढ़ाना जिससे जलवायु परिवर्तन से मुकाबला किया जा सके। इस तरह के सारगर्भित एवं ज्ञानवर्धक गतिविधियों को आयोजित करने हेतु छात्राओं द्वारा रूचि दिखाई गई एवं आगेभी ऐसी गतिविधियों का आयोजन करने का अनुरोध किया गया। मंच का सफल संचालन डॉ. प्रगति जोशी द्वारा किया गया एवं आभार प्रदर्शन इको क्लब प्रभारी डॉ. रागिनी सिकरवार द्वारा किया गया। कार्यशाला में डॉ. भारती दुबे, आयोजन समिति सदस्यों में डॉ. श्रीकांत दुबे, डॉ. हर्षा चचाने, डॉ. मनीषचंद्र चौधरी, डॉ. राहुल चौहान, डॉ. अमित मनहास, श्रीमती प्रीति मालवीय, डॉ. प्रदीप सिंह चौहान, डॉ. वर्षा भींगरकर, डॉ. श्रद्धा गुप्ता, धीरज खातरकर एवं समस्त महाविद्यालय स्टॉफ उपस्थित रहे एवं भारी संख्या में छात्राओं ने प्रतिभागिता की।

