नर्मदापुरम / त्रिदिवसीय गीता जयंती महोत्सव के दूसरे दिवस स्थानीय तिलक भवन में आयोजित ज्ञान सत्र में सुबोधानंद फाऊंडेशन ऋषिकेश से पधारे स्वामी ध्रुव चैतन्य सरस्वती ने अपने उद्बोधन में कहा कि यदि हम प्रवृत्ति के मार्ग में कर्मरत हैं तो हमारे कर्मों की दिशा अंतःकरण की शुद्धि होनी चाहिए । यदि हम प्रवृत्ति मार्ग में रहकर अपने कर्मों का उचित निर्वहन करते हैं तो एक अवस्था ऐसी आती है जब हमें प्रकृति स्वयं ही निवृति का मार्ग प्रशस्त करती है। कर्तव्य से भाग कर ली गई। निवृत्ति हमें पुनः प्रवृत्ति की ओर धकेलती है, श्रीमद्भागवत गीता वेदों श्रुतियों का सार है, गीता के संबंध में दो बातें ऐसी प्रचलित हैं जैसे फल की इच्छा मत करो, कर्म करते जाओ। फल की इच्छा के बिना कर्म संभव नहीं है। यह बात गीता में कहीं नहीं है बल्कि कामना की पूर्ति कैसे करना चाहिए यह उपदेश है, कामना शून्यता की स्थिति ज्ञानी की होती है। जीवन में कामनाएं कब एक खत्म होती है, निषिद्ध कामनाओं का परित्याग करें, ईश्वर दर्शन में हमें आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है हमारी छोटी कामनाओं से आत्मज्ञान का परमानंद होता है, अतः कामनाओं का निषेध कहीं नहीं है, बल्कि कामना को भगवान की विभूति बताया गया है। कामना के बिना कोई कर्म संभव नहीं है तब कामना का स्वरूप क्या है कैसे पूरी हो तीसरे अध्याय में भगवान कहते हैं यज्ञ भगवान भावना से उत्प्रोत हो, उन्नति को प्राप्त करना चाहिए। कार्यक्रम के प्रारंभ में ऋषिकुल सँस्कृत विधालय के विद्यार्थियों द्वारा सस्वर सामुहिक श्रीगीताजी का पाठ किया गया। प्रवचन के पूर्व स्वामी जी का पुष्पहारों से स्वागत समारोह समिति के अध्यक्ष, पूर्व विधायक पं. गिरिजा शंकर शर्मा, डॉ. पं. गोपाल प्रसाद खड्डर, राकेश फौजदार, आशीष अग्रवाल, सुरेश अग्रवाल, एल एल दुबे, रोहित तिवारी, राकेश शर्मा, डॉ. नमन तिवारी, अंकित अग्रवाल, विकास अत्री, शिब्बू यादव, मल्लू यादव, डी एस दांगी, आमीन राइन एवं माधव दुबे ने किया । भजनञ्जली के अंतर्गत गायक ऋत्विक राजपूत द्वारा भजन की प्रस्तुति की गई, संगत में हारमोनियम पर आदित्य परसाई और तबले पर आनंद नामदेव ने सहयोग किया, संचालन डॉ. संजय गार्गव ने किया ।

