
नर्मदापुरम / बिश्नोई पंथ स्थापना दिवस हर साल कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी (कार्तिक बदी अष्टमी) को मनाया जाता है। इस पावन दिन पर गुरु जम्भेश्वर भगवान (जाम्भोजी) ने बिश्नोई पंथ की नींव रखी थी।
वर्ष 2026 में, कार्तिक कृष्ण अष्टमी 2 नवंबर 2026, सोमवार को पड़ रही है, जिस दिन बिश्नोई समाज अपना 542वां स्थापना दिवस मनाएगा।
बिश्नोई पंथ का महत्व
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बिश्नोई पंथ का मुख्य महत्व पर्यावरण संरक्षण, वन्यजीव रक्षा और मानवता के कल्याण में निहित है।
• 29 नियम: इस पंथ का नाम ‘बिश्नोई’ दो शब्दों से मिलकर बना है— बीस (20) और नौ (9)। गुरु जम्भेश्वर जी ने अपने अनुयायियों को 29 नियमों की एक आचार संहिता दी, जिसमें जीव-जंतुओं की रक्षा करना, हरे पेड़ों (विशेषकर खेजड़ी) को न काटना, शुचिता बनाए रखना और नशामुक्त जीवन जीना शामिल है।
• पारिस्थितिक चेतना: बिश्नोई समुदाय को दुनिया का पहला सबसे बड़ा पर्यावरण रक्षक समाज माना जाता है, जिन्होंने प्रकृति की रक्षा के लिए सैकड़ों वर्ष पहले ही नियम बना दिए थे।
स्थापना की पावन कथा….
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बिश्नोई पंथ की स्थापना की कथा 15वीं शताब्दी के मरुस्थल (राजस्थान) से जुड़ी है।
समराथल धोरा पर महायज्ञ….
विक्रम संवत 1542 (सन 1485 ईस्वी) की कार्तिक कृष्ण अष्टमी के दिन, गुरु जम्भेश्वर महाराज ने राजस्थान के बीकानेर जिले में स्थित समराथल धोरा नामक पावन बालुका स्तूप (रेत के टीले) पर एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया।
29 नियम और पाहल का निर्माण….
उस समय देश में धार्मिक और सामाजिक चेतना अत्यंत कमजोर हो चुकी थी, और लोग प्रकृति व जीवन के सही मार्ग को भूल रहे थे। समाज को सही दिशा देने के लिए गुरु जाम्भोजी ने 120 शब्दों की वाणी (जम्भवाणी) का उच्चारण किया और मानव कल्याण के लिए 29 पवित्र नियम निर्धारित किए। इसके बाद उन्होंने मंत्रोच्चार के साथ एक कलश में पवित्र जल तैयार किया, जिसे ‘अमृत पाहल’ कहा जाता है।
पहले बिश्नोई की दीक्षा….
कथा के अनुसार, गुरु महाराज ने सबसे पहले अपने सगे चाचा पुल्हो जी को यह पवित्र पाहल (अमृत जल) पिलाया और 29 नियमों की दीक्षा देकर उन्हें इस धर्म में दीक्षित किया। इसके बाद उपस्थित अन्य लोगों ने भी पुराने बंधनों व कुरीतियों को छोड़कर गुरु महाराज के हाथों से चडू (पाहल) ग्रहण किया। इस प्रकार समराथल धोरा की धरती से बिश्नोई पंथ का उदय हुआ।
तब से लेकर आज तक, प्रत्येक वर्ष बिश्नोई समाज के लोग इस दिन को बेहद श्रद्धा, उत्साह और यज्ञ-हवन (जांभोजी के नियमों के अनुसार) करके उत्सव के रूप में मनाते हैं।(संकलन – प्रीति चौहान)

