
नर्मदापुरम / महर्षि वाल्मीकि जयंती संस्कृत साहित्य के प्रथम कवि (आदि कवि) और महान महाकाव्य ‘रामायण’ के रचयिता महर्षि वाल्मीकि के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है। वर्ष 2026 में महर्षि वाल्मीकि जयंती 26 अक्टूबर 2026 को मनाई जाएगी। यह हिंदू पंचांग के अनुसार आश्विन मास की पूर्णिमा (शरद पूर्णिमा) के दिन पड़ती है।
महर्षि वाल्मीकि की कहानी (रूपांतरण की गाथा)
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• पूर्व जीवन (रत्नाकर डाकू): पौराणिक कथाओं के अनुसार, महर्षि वाल्मीकि का शुरुआती नाम रत्नाकर था और वे अपने परिवार का पालन-पोषण करने के लिए जंगल में आने-जाने वाले लोगों को लूटा करते थे।
• नारद मुनि से भेट: एक बार उनकी मुलाकात देवर्षि नारद मुनि से हुई। नारद जी ने उनसे पूछा कि जो पाप वे अपने परिवार के पेट के लिए कर रहे हैं, क्या उनके पापों के भागीदार उनके परिवार के सदस्य बनेंगे?
• पश्चाताप और तपस्या: रत्नाकर ने घर जाकर अपने परिजनों से पूछा, तो सभी ने पाप का भागीदार बनने से इंकार कर दिया। इससे उनका मोह भंग हो गया।
• राम नाम का जप: नारद मुनि ने उन्हें राम नाम का जप करने को कहा। रत्नाकर ‘राम’ का नाम उल्टा यानी ‘मरा-मरा’ जपने लगे, जो निरंतर जपते-जपते शुद्ध होकर ‘राम’ बन गया।
• वाल्मीकि नाम प्राप्ति: वर्षों की गहरी तपस्या के दौरान उनके शरीर के चारों ओर दीमकों ने बामी (टीला) बना ली थी। जब तपस्या पूरी हुई, तो दिव्य वाणी ने उन्हें ‘वाल्मीकि’ नाम दिया, जिसका अर्थ है ‘बामी से उत्पन्न’।
महत्व
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• आदि कवि का सम्मान: उन्हें संस्कृत अनुष्टुप छंद और प्रथम महाकाव्य रामायण (24,000 श्लोक) की रचना करने के लिए ‘आदि कवि’ के रूप में पूजा जाता है।
• सच्चाई और बदलाव का संदेश: उनकी जीवन कथा यह सिखाती है कि व्यक्ति चाहे कितना भी अंधकार या बुरे मार्ग पर हो, पश्चाताप और ज्ञान से वह महान संत बन सकता है।
• प्रगट दिवस: वाल्मीकि समाज द्वारा इसे प्रगट दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। इस अवसर पर मंदिरों में रामायण का पाठ, भजन-कीर्तन, शोभा यात्राएं और लंगर (दान-पुण्य) का आयोजन किया जाता है।(संकलन – प्रीति चौहान)

