
नर्मदापुरम / सरकारी कार्यालयों में समय पर उपस्थिति और निर्धारित जिम्मेदारियों का निर्वहन प्रशासनिक व्यवस्था की बुनियादी शर्त है, लेकिन जब कार्यालयीन समय में विभागीय कामकाज प्रभावित होने की स्थिति बनती है, तो इसका सीधा असर आम जनता पर पड़ता है। इसी मुद्दे पर नवागत कलेक्टर आशीष वशिष्ठ ने अधिकारियों को स्पष्ट संदेश दिया है कि कार्यालयीन समय में विभागीय कार्यों को प्राथमिकता दी जाए और अन्य जनहितैषी गतिविधियों में सहभागिता के कारण नियमित शासकीय कामकाज प्रभावित नहीं होना चाहिए।
15 अक्टूबर को अधिकारियों के साथ परिचयात्मक बैठक में दिए गए इस निर्देश को प्रशासनिक अनुशासन और जवाबदेही के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कलेक्टर ने अधिकारियों को कार्यालयीन समय का विशेष ध्यान रखने और विभागीय कार्यों को प्राथमिकता के साथ समय पर पूरा करने के निर्देश दिए।
जनसेवा के नाम पर सरकारी कामकाज की अनदेखी नहीं……
कलेक्टर के निर्देश का स्पष्ट आशय है कि जनहितैषी गतिविधियों में भागीदारी अपनी जगह है, लेकिन इसके कारण विभागीय जिम्मेदारियों से समझौता स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। सरकारी कार्यालयों में आने वाले नागरिक अपने काम के लिए अधिकारियों और कर्मचारियों पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में कार्यालयीन समय का सही उपयोग और समय पर काम पूरा करना प्रशासन की जवाबदेही का अहम हिस्सा है।
जनहित की गतिविधियों में सक्रियता तभी सार्थक है, जब आम जनता के नियमित काम भी समय पर पूरे हों। यदि किसी अधिकारी की अन्य गतिविधियों के कारण विभागीय काम लंबित रहता है, तो उसका खामियाजा संबंधित नागरिक को भुगतना पड़ सकता है। कलेक्टर का निर्देश इसी संतुलन को सुनिश्चित करने पर केंद्रित है।
समय की पाबंदी के साथ कामकाज की भी होगी कसौटी…….
कलेक्टर आशीष वशिष्ठ ने केवल कार्यालय में समय पर उपस्थित रहने पर ही जोर नहीं दिया, बल्कि विभागीय दायित्वों को गंभीरता से निभाने और प्रशासनिक कार्यों में समयबद्धता सुनिश्चित करने की बात भी कही। अधिकारियों को बैठकों में पूरी तैयारी के साथ आने और अपने विभागीय पोर्टल पर अद्यतन जानकारी रखने के निर्देश दिए गए हैं।
इससे प्रशासनिक कामकाज में केवल औपचारिक उपस्थिति के बजाय वास्तविक कार्यप्रगति और जवाबदेही पर जोर देने का संकेत मिलता है।
असली परीक्षा निर्देशों के पालन की…….
नवागत कलेक्टर के निर्देशों का प्रभाव अब उनके पालन से तय होगा। क्या कार्यालयीन समय में आम नागरिकों के काम समय पर होंगे? क्या विभागीय जिम्मेदारियों के निर्वहन में लापरवाही कम होगी? और क्या अधिकारियों की जवाबदेही केवल बैठकों तक सीमित न रहकर जमीनी स्तर पर भी दिखाई देगी? ये सवाल आने वाले समय में प्रशासनिक व्यवस्था की वास्तविक तस्वीर सामने लाएंगे।
फिलहाल कलेक्टर का संदेश स्पष्ट है—सरकारी पद के साथ मिली जिम्मेदारी सर्वोपरि है। अन्य गतिविधियों में सहभागिता हो सकती है, लेकिन उसकी कीमत आम जनता के रुके हुए कामों के रूप में नहीं चुकाई जानी चाहिए।

