
जबलपुर / मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य की सरकारी नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को 27 प्रतिशत आरक्षण देने के निर्णय को खारिज करते हुए इसे पुनः 14 प्रतिशत पर सीमित कर दिया है। जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की खंडपीठ ने करीब 159 पृष्ठों के अपने विस्तृत निर्णय में 8 मार्च 2019 के तत्कालीन कमलनाथ सरकार के अध्यादेश से बढ़ाए गए 27% आरक्षण के प्रावधान को अमान्य ठहरा दिया।
अदालत के इस फैसले की प्रमुख बातें: 13% होल्ड पदों पर 3 महीने में नियुक्ति: 29 सितंबर 2022 से लागू 87-13 फीसदी के फॉर्मूले के तहत जिन 13% पदों को होल्ड पर रखा गया था, उन पर अब अनारक्षित वर्ग के पात्र उम्मीदवारों को 3 महीने के भीतर नियुक्ति देने का आदेश एमपीपीएससी (MPPSC) और कर्मचारी चयन मंडल (MPESB) समेत भर्ती एजेंसियों को दिया गया है। पूर्व नियुक्तियों को संरक्षण: मार्च 2019 से 29 सितंबर 2022 के बीच 27% कोटे के तहत नौकरी पा चुके ओबीसी अभ्यर्थियों की सेवाएं सुरक्षित रहेंगी; उनकी नियुक्तियां रद्द नहीं की जाएंगी। 29 सितंबर 2022 के बाद के मामलों पर रोक: हालांकि, 29 सितंबर 2022 के बाद 14 फीसदी से अधिक कोटे पर की गई नई नियुक्तियों को अमान्य माना गया है और उन पर अदालत के निर्देशों के तहत कार्रवाई होगी। सुप्रीम कोर्ट में चुनौती के आसार यदि यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचता है, तो वहां 27% आरक्षण की संवैधानिक वैधता, कुल आरक्षण की 50% सीमा और राज्य सरकार द्वारा पेश आंकड़ों की पर्याप्तता जैसे बिंदुओं पर कानूनी बहस देखने को मिल सकती है।

