

नर्मदापुरम् / प्रज्ञा प्रवाह मध्य भारत प्रांत के तत्वावधान में प्री-लोकमंथन-2026, वन्दे मातरम् एवं युवा संकल्प कार्यक्रम का आयोजन गर्ल्स होम साइंस कॉलेज नर्मदापुरम् में किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ माँ भारती के पूजन एवं वन्दे मातरम् के सामूहिक गान के साथ हुआ। इस अवसर पर अतिथियों का परिचय एवं स्वागत किया गया।
कार्यक्रम की भूमिका रखते हुए सुनील सिंह ने कहा कि लोकमंथन का अर्थ किसी वैचारिक विषय पर समाज के विभिन्न वर्गों के अभिमत एवं विचारों का मंथन करना है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में विमर्श और नैरेटिव के माध्यम से समाज को प्रभावित करने के प्रयास पहले की अपेक्षा अधिक कुटिल रूप में सामने आ रहे हैं। ऐसे समय में सत्य एवं भारतीय दृष्टि को केंद्र में रखकर विमर्श आवश्यक है।
उन्होंने बताया कि लोकमंथन की यात्रा वर्ष 2016 से प्रारंभ हुई और वर्ष 2026 में राजस्थान के जयपुर में 4 से 6 दिसंबर तक लोकमंथन का आयोजन प्रस्तावित है। उन्होंने नागरिकों से lokmanthan.org के माध्यम से पंजीयन करने का आह्वान किया।
वन्दे मातरम् का ऐतिहासिक और राष्ट्रीय महत्व……
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं वक्ता मनोज श्रीवास्तव, राज्य निर्वाचन आयुक्त, मध्यप्रदेश ने वन्दे मातरम् के ऐतिहासिक, साहित्यिक, दार्शनिक एवं संवैधानिक पक्षों पर विस्तार से विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि वन्दे मातरम् को उसके संपूर्ण ऐतिहासिक संदर्भ में समझना आवश्यक है। यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारतीयों में आत्मविश्वास और राष्ट्रीय चेतना जगाने वाला महत्वपूर्ण स्वर रहा है।
उन्होंने बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय और वन्दे मातरम् की रचना के कालक्रम का उल्लेख करते हुए कहा कि वन्दे मातरम् की रचना वर्ष 1875 में हुई थी, जबकि ‘आनंदमठ’ का प्रकाशन वर्ष 1882 में हुआ। इस प्रकार गीत की रचना उपन्यास से सात वर्ष पूर्व हुई थी। उनके अनुसार मूल गीत के भाव को केवल उपन्यास की कथावस्तु के आधार पर समझना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं है।
श्री श्रीवास्तव ने कहा कि वन्दे मातरम् के एक-एक शब्द के पीछे ऐतिहासिक संदर्भ और औचित्य है। उन्होंने इसे चेतना की उच्च अवस्था में रचित रचना बताते हुए कहा कि इसके मूल स्वरूप में मंत्र की अखंडता का भाव निहित है। उनके अनुसार मंत्र की शक्ति उसकी समग्रता में होती है और इसी प्रकार वन्दे मातरम् की राष्ट्रीय चेतना को भी उसके संपूर्ण संदर्भ में समझना चाहिए।
उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में वन्दे मातरम् की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्ष 1905 के बंग-भंग आंदोलन के दौरान यह जनआंदोलन का प्रमुख स्वर बना। वर्ष 1896 से 1936 तक कांग्रेस के अनेक अधिवेशनों में इसका गायन हुआ। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन में विभिन्न समुदायों के लोगों ने भी वन्दे मातरम् को अपनाया और गाया। इसलिए स्वतंत्रता संग्राम के इस पक्ष को सभी भारतीयों के संयुक्त संघर्ष के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
वन्दे मातरम् के काव्य और सांस्कृतिक आयाम….
श्री श्रीवास्तव ने वन्दे मातरम् के काव्य-शिल्प की व्याख्या करते हुए कहा कि इसके संपूर्ण स्थापत्य में प्रकृति, जन और संस्कृति का समन्वय दिखाई देता है।
उन्होंने ‘सुजलाम् सुफलाम् मलयजशीतलाम्’ के माध्यम से प्रकृति, ‘कोटि-कोटि कंठ कल-कल निनाद कराले’ के माध्यम से जन तथा ‘त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी, कमला कमलदलविहारिणी, वाणी विद्यादायिनी’ के माध्यम से संस्कृति के भाव को रेखांकित किया।
उन्होंने कहा कि गीत में दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के संदर्भों को मूर्ति के रूप में नहीं, बल्कि उच्चतर काव्य-बिंब के रूप में समझना चाहिए। ये शक्ति, समृद्धि और ज्ञान के प्रतीक हैं। साहित्यिक दृष्टि से काव्य-बिंब चेतना में ऊर्जा का संचार करते हैं।
उन्होंने कहा कि गीत के कुछ अंशों को अलग कर देखने से उसके जन और संस्कृति से जुड़े व्यापक तत्वों को समझने में कठिनाई होती है और राष्ट्र की अवधारणा केवल भौगोलिक संरचना तक सीमित होकर रह जाती है।
औपनिवेशिक दृष्टिकोण के संदर्भ में वन्दे मातरम्……..
श्री श्रीवास्तव ने वन्दे मातरम् के कुछ शब्दों की ऐतिहासिक व्याख्या करते हुए कहा कि इसके पीछे भारत के औपनिवेशिक अनुभव और आत्मबल जागरण का संदर्भ भी मौजूद है।
उन्होंने ‘बहुबलधारिणी’ शब्द का उल्लेख करते हुए कहा कि औपनिवेशिक विचारकों द्वारा भारतीयों को शारीरिक रूप से दुर्बल, कायर और स्त्रैण बताने का प्रयास किया गया था। ऐसे संदर्भ में बंकिम चंद्र ने ‘अबला केन मा एत बले’ और ‘बहुबलधारिणीम्’ जैसे शब्दों के माध्यम से भारत को उसकी शक्ति और आत्मबल का स्मरण कराया।
इसी प्रकार ‘रिपुदलवारिणी’ को उन्होंने भारत के ऐतिहासिक शत्रु-बोध का परिचायक बताया। ‘भूषिताम्’ शब्द की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि अंग्रेज भारत को अपने साम्राज्य के मुकुट का रत्न मानते थे, जबकि बंकिम ने भारत माता को स्वयं आभूषित और जाग्रत चेतना के रूप में प्रस्तुत किया।
वन्दे मातरम् और संवैधानिक संदर्भ…..
श्री श्रीवास्तव ने वन्दे मातरम् के संवैधानिक संदर्भ का उल्लेख करते हुए कहा कि 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने वन्दे मातरम् को जन गण मन के बराबर का राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त गीत के रूप में स्वीकार किया था। उन्होंने कहा कि संविधान सभा में किसी संवैधानिक संस्था द्वारा वन्दे मातरम् को केवल दो छंदों तक सीमित करने का निर्णय नहीं लिया गया था।
उन्होंने कहा कि वन्दे मातरम् और जन गण मन दोनों का अपने-अपने स्थान पर राष्ट्रीय सम्मान है और वन्दे मातरम् की ऐतिहासिक भूमिका को स्वतंत्रता आंदोलन के व्यापक संदर्भ में समझना चाहिए।
वन्दे मातरम् को लेकर वर्तमान विवाद पर विचार…….
वर्तमान परिवेश में वन्दे मातरम् को लेकर उत्पन्न विवाद के संदर्भ में श्री श्रीवास्तव ने कहा कि अनुवाद की भाषा और मूल गीत की व्याख्या के बीच अंतर के कारण कई भ्रांतियां उत्पन्न हुई हैं। उन्होंने कहा कि गीत में कहीं भी मूर्ति पूजा का उल्लेख नहीं है।
उन्होंने भारत को माता के रूप में देखने की अवधारणा को मातृभूमि के भाव से जोड़ते हुए कहा कि विश्व के अनेक राष्ट्रगानों में अपने देश को माता के रूप में संबोधित किया गया है। उन्होंने बांग्लादेश के राष्ट्रगान में ‘माता’ शब्द के उल्लेख के साथ-साथ अजरबैजान, मिस्र, सूडान और अन्य देशों के उदाहरणों का उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि भारत की मातृभूमि की वंदना को इसी व्यापक सांस्कृतिक और राष्ट्रीय संदर्भ में समझना चाहिए। उन्होंने वन्दे मातरम् को किसी एक संप्रदाय तक सीमित किए जाने की प्रवृत्ति पर भी अपनी बात रखी और कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन में इसकी भूमिका किसी संप्रदाय विशेष की स्वीकृति पर निर्भर नहीं थी।
श्री श्रीवास्तव ने कहा कि भारत के विभाजन और उससे जुड़े ऐतिहासिक घटनाक्रम को देखते हुए राष्ट्रीय एकता और अखंडता के संदर्भ में वन्दे मातरम् के भाव को समझना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि वन्दे मातरम् की अखंडता और उसके मूल भाव को राष्ट्रीय चेतना एवं अखंडता के व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
वन्दे मातरम् और राष्ट्रीय चेतना……
श्री श्रीवास्तव ने कहा कि वन्दे मातरम् ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारतीयों में आत्मविश्वास, राष्ट्रीय चेतना और स्वतंत्रता की भावना को जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि गीत के प्रत्येक शब्द में भारत के इतिहास, प्रकृति, संस्कृति, शक्ति और ज्ञान की अभिव्यक्ति दिखाई देती है।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत और राज्य के बीच दूरी तथा अविश्वास की भावना पैदा करने के प्रयासों को समझने की आवश्यकता है। उनके अनुसार भारतीय दृष्टि को केंद्र में रखकर लोक और राष्ट्र के संबंधों पर विमर्श आवश्यक है।
वन्दे मातरम् ने आत्मविश्वास और राष्ट्रीय चेतना जगाई – मथुरा प्रसाद….
कार्यक्रम के अध्यक्ष श्री मथुरा प्रसाद जी, अतिरिक्त संचालक (सेवानिवृत्त), उच्च शिक्षा विभाग, मध्यप्रदेश शासन ने कहा कि वन्दे मातरम् अखंड भारत की वंदना के भाव से रचा गया था। जब भारतीय समाज में हीनता का भाव था, तब इस गीत ने लोगों में आत्मविश्वास और राष्ट्रीय चेतना का संचार किया।
उन्होंने कहा कि भारत की धरती सभी भारतीयों की मातृभूमि है और जब सभी लोग अपनी मातृभूमि से जुड़े हुए हैं, तो उसकी वंदना के भाव को समझना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि जिस गीत ने भारतीयों को स्वतंत्रता के लिए प्रेरित किया और अंग्रेजी शासन को भारत छोड़ने के लिए प्रेरित करने वाले जनभाव को मजबूत किया, उसके ऐतिहासिक योगदान को समझना आवश्यक है।
गणमान्य नागरिक एवं विद्यार्थी रहे उपस्थित….
कार्यक्रम में सुश्री दुर्गा कालोस, समाजसेवी; डॉ. भारती दुबे, प्राचार्या, गर्ल्स होम साइंस कॉलेज; ताहिर अली; सुनील सिंह सहित अनेक गणमान्य नागरिक एवं बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के अंत में संतोष व्यास ने सभी अतिथियों, आयोजकों एवं उपस्थित नागरिकों के प्रति आभार व्यक्त किया।

