नर्मदापुरम / पितृपक्ष में भगवान पितरों को धरती पर जाने का आदेश क्यों देते हैं ? यह प्रश्न केवल एक तिथि का नहीं, यह प्रश्न सृष्टि के सबसे बड़े रहस्य – मृत्यु के बाद जीवन का रहस्य है। पितृपक्ष क्या है, 15 दिन के लिए हमारे पितर धरती पर क्यों आते हैं, भगवान उन्हें आदेश क्यों देते हैं, इसका उत्तर आपको एक नहीं, पांच पुराणों और तीन शाप-कथाओं को जोड़कर समझना पड़ेगा।
पहला अध्याय पितृलोक क्या है, कहां है ?….
हम सोचते हैं, स्वर्ग और नर्क बस दो ही लोक हैं। पर गरुड़ पुराण कहता है, सृष्टि में 14 लोक हैं, 7 ऊपर, 7 नीचे। ऊपर के लोकों में – भू, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम्। भू लोक यह धरती है, जहां हम रहते हैं। भुवः लोक अंतरिक्ष है, जहां भूत-प्रेत, पिशाच रहते हैं। स्वः लोक इंद्र का स्वर्ग है, जहां देवता रहते हैं।
पर पितरों का लोक इनसे अलग है। पितृलोक, चंद्रमा के ऊपर और सूर्य से नीचे, एक विशेष स्थान पर है, जिसे *पितृलोक या यमलोक का एक भाग* कहा जाता है। इस लोक के अधिपति हैं *अर्यमा*, जो 12 आदित्यों में से एक हैं, और पितरों के राजा हैं,l और इनके न्यायाधीश हैं *यमराज*।
हर जीव जब मरता है, तो उसकी तीन गतियां होती हैं। यदि उसने बहुत पाप किए हैं, तो वह नरक में जाता है। यदि बहुत पुण्य किए हैं, तो स्वर्ग में जाता है। पर 90% सामान्य मनुष्य, जिनमें पाप और पुण्य दोनों हैं, वे पितृलोक में जाते हैं। वहां वे अपने परिवार के लोगों की प्रतीक्षा करते हैं, कि कब उनका पुत्र, पौत्र, उनके नाम से पिंडदान, तर्पण, श्राद्ध करेगा, ताकि उन्हें आगे की गति मिले, मुक्ति मिले।
गरुड़ पुराण कहता है, पितर, वायु रूप में होते हैं, उनका शरीर सूक्ष्म होता है, उन्हें भूख लगती है, प्यास लगती है, पर वे अन्न नहीं खा सकते, वे केवल गंध और भाव से तृप्त होते हैं। जब उनका पुत्र उनके नाम से जल देता है, काले तिल के साथ, *”इदं पितृभ्यः नमः”* कहकर, तो वह जल, मंत्र के द्वारा, अमृत बनकर, सीधा पितृलोक में उनके पास पहुंच जाता है। और जब पिंडदान होता है, तो वह चावल का पिंड, उनके लिए दिव्य भोजन बन जाता है।
अब प्रश्न उठता है, तो पितर पितृलोक में ही तृप्त क्यों नहीं हो जाते, उन्हें धरती पर आने की क्या आवश्यकता है?
दूसरा अध्याय तीन ऋण का सिद्धांत….
सनातन धर्म कहता है, हर मनुष्य जन्म लेते ही, तीन ऋणों के साथ पैदा होता है – *देव ऋण, ऋषि ऋण, और पितृ ऋण।*
देव ऋण हम देवताओं से सूर्य का प्रकाश, चंद्रमा की शीतलता, इंद्र का जल, वायु की सांस लेते हैं, इसलिए यज्ञ-पूजन करके हमें देव ऋण चुकाना होता है।
ऋषि ऋण हम वेद, शास्त्र, ज्ञान, जो ऋषियों ने हजारों वर्ष तपस्या करके हमें दिया, उससे हम शिक्षित होते हैं, इसलिए स्वाध्याय करके, ज्ञान बांटकर, हमें ऋषि ऋण चुकाना होता है।
और तीसरा, सबसे बड़ा ऋण पितृ ऋण। यह शरीर हमें हमारे माता-पिता ने दिया, यह नाम हमें हमारे दादा-परदादा ने दिया, यह जमीन-जायदाद, संस्कार, गोत्र, सब हमें पितरों से मिला। इसलिए संतान उत्पन्न करके, उनका श्राद्ध-तर्पण करके, हमें पितृ ऋण चुकाना होता है।
यदि कोई मनुष्य पितृ ऋण नहीं चुकाता, तो उसके पितर पितृलोक में अतृप्त रहते हैं, भूखे-प्यासे भटकते हैं, और वे दुखी होकर, अपने ही वंश को श्राप दे देते हैं, जिसे *पितृदोष* कहते हैं। पितृदोष से घर में संतान नहीं होती, धन नहीं टिकता, विवाह में बाधा आती है, रोग पीछा नहीं छोड़ता।
इसलिए भगवान ने एक व्यवस्था बनाई….
तीसरा अध्याय भगवान का आदेश, सूर्य के कन्या राशि में आने पर
आपने देखा होगा, पितृपक्ष हमेशा तब आता है, जब सूर्य, कन्या राशि में प्रवेश करता है। इसे *कनागत* भी कहते हैं। ज्योतिष कहता है, कन्या राशि, पितरों की राशि है।
पद्म पुराण और ब्रह्म वैवर्त पुराण में कथा आती है, सृष्टि के आरंभ में, ब्रह्मा जी ने जब पितरों की रचना की, तो पितर बहुत भूखे थे, उन्होंने ब्रह्मा जी से कहा, हे सृष्टिकर्ता, हमारे लिए भोजन की व्यवस्था कीजिए। ब्रह्मा जी ने कहा, तुम्हारे वंशज जो तुम्हें श्राद्ध में भोजन देंगे, वही तुम्हारा भोजन होगा।
पर पितर पितृलोक से देख नहीं सकते कि उनका वंशज क्या कर रहा है, वे सूक्ष्म लोक में हैं। इसलिए भगवान विष्णु ने, यमराज को आदेश दिया, और यमराज ने नियम बनाया –
“आश्विन मास के कृष्ण पक्ष के 15 दिन, जब सूर्य कन्या राशि में होगा, तब मैं पितृलोक के द्वार खोल दूंगा, और सभी पितरों को मैं 15 दिन के लिए, पृथ्वी पर, अपने-अपने वंशजों के घर जाने की अनुमति दूंगा, ताकि वे स्वयं देख सकें, कि उनका वंशज उन्हें याद कर रहा है या नहीं, उनका श्राद्ध कर रहा है या नहीं।”
इसे ऐसे समझिए, जैसे जेल में कैदियों को, साल में एक बार, अपने घर जाने के लिए पैरोल मिलती है। वैसे ही, यमराज, पितरों को 15 दिन की पैरोल देते हैं, धरती पर आने की।
और इसीलिए, पितृपक्ष में भगवान, पितरों को आदेश देते हैं – “गच्छ, वत्स, पृथ्वी पर जाओ, देखो तुम्हारे पुत्र तुम्हें याद करते हैं या नहीं।”
यदि वंशज श्राद्ध करता है, तर्पण करता है, ब्राह्मण को भोजन कराता है, तो पितर तृप्त होकर, आशीर्वाद देकर वापस जाते हैं। और यदि वंशज नहीं करता, भूल जाता है, तो पितर निराश होकर, भूखे-प्यासे, रोते हुए, वापस पितृलोक चले जाते हैं, और श्राप दे जाते हैं।
चौथा अध्याय तीन पौराणिक कथाएं, जो इसका प्रमाण हैं…..
1. महाभारत की कर्ण की कथा…..
आप सब जानते हैं, कर्ण, कुंती का पुत्र था, पर दानवीर था, वह सोना, चांदी, हीरे-मोती, सब दान करता था, पर उसने कभी अन्न का दान नहीं किया था। जब कर्ण युद्ध में मारा गया, और स्वर्ग में गया, तो उसे खाने के लिए सोना-चांदी दिया गया। कर्ण ने इंद्र से पूछा, मैं सोना कैसे खाऊं। इंद्र ने कहा, तुमने जीवन भर सोना दान किया, अन्न दान कभी नहीं किया, इसलिए तुम्हें यही मिलेगा। कर्ण ने कहा, मुझे तो पता ही नहीं था कि मेरे पितर कौन हैं, इसलिए मैंने पितरों के नाम का श्राद्ध कभी नहीं किया। तब इंद्र ने कृपा करके, कर्ण को 15 दिन के लिए, पृथ्वी पर वापस भेजा, और कहा, जाओ, इन 15 दिनों में अन्न दान करो, अपने पितरों का श्राद्ध करो। वही 15 दिन, पितृपक्ष कहलाए। कर्ण ने धरती पर आकर, गरीबों को अन्न दान किया, पितरों का तर्पण किया, और फिर उसे स्वर्ग में अन्न मिला। यह कथा इस बात का प्रमाण है कि स्वयं देवता भी चाहते हैं, कि पितर 15 दिन धरती पर आकर, अन्न प्राप्त करें।
2. राजा निमि और अत्रि ऋषि की कथा….
ब्रह्म पुराण में कथा है, सबसे पहला श्राद्ध, महर्षि अत्रि के पुत्र, महर्षि निमि ने किया था। निमि के पिता अत्रि की मृत्यु हो गई, तो निमि ने अपने पिता के नाम से, श्राद्ध में ब्राह्मणों को भोजन कराया। पर वह भोजन, सीधा पितृलोक में नहीं पहुंचा, वह इधर-उधर भटक गया। तब अत्रि ऋषि, पितृ रूप में, स्वयं धरती पर आए, और उन्होंने निमि से कहा, पुत्र, तुमने मंत्रों के बिना भोजन कराया, इसलिए मुझे प्राप्त नहीं हुआ। तब ब्रह्मा जी ने श्राद्ध की विधि बनाई, मंत्र बनाए, कि कैसे पितर धरती पर आकर भोजन ग्रहण करेंगे। तभी से यह नियम बना, कि पितर धरती पर आएंगे, और विधि से दिया गया भोजन ग्रहण करेंगे।
3. भगवान राम द्वारा दशरथ का श्राद्ध…..
जब भगवान राम वनवास में थे, और उन्हें पता चला कि राजा दशरथ का स्वर्गवास हो गया है, तो उन्होंने नासिक में, गोदावरी नदी के तट पर, अपने पिता का श्राद्ध किया। कहते हैं, उस समय राजा दशरथ स्वयं, पितृ रूप में, वहां आए, और राम के हाथ से पिंड ग्रहण किया। और राम ने वरदान मांगा, हे पिताजी, आप तृप्त हो जाइए। दशरथ ने कहा, पुत्र, मैं तभी तृप्त होऊंगा, जब तुम यह नियम बना दोगे कि हर पुत्र, हर वर्ष, अपने पिता के लिए 15 दिन पितृपक्ष में धरती पर आने का मार्ग खोलेगा। राम ने तथास्तु कहा। इसलिए, स्वयं भगवान राम ने भी, पितरों को धरती पर आने का नियम बनाया।
पांचवां अध्याय वैज्ञानिक और आध्यात्मिक कारण…..
भगवान पितरों को धरती पर क्यों भेजते हैं, इसका एक वैज्ञानिक कारण भी है।
पितृपक्ष, वर्षा ऋतु के बाद आता है। वर्षा ऋतु में, पृथ्वी पर नमी, कीड़े-मकोड़े, जीवाणु बहुत बढ़ जाते हैं। हमारे ऋषियों ने, इस समय, 15 दिन तक, घर में हवन, पिंडदान, ब्राह्मण भोजन, गाय को घास, कौए को रोटी, कुत्ते को भोजन, चींटी को शक्कर देने का नियम बनाया।
कौआ, जिसे हम पितरों का प्रतीक मानते हैं, वह इस समय, प्रकृति का सबसे बड़ा सफाईकर्मी है, वह गंदगी खाकर, पर्यावरण को साफ करता है। गाय, कुत्ता, चींटी, ये सब पर्यावरण के अंग हैं। इनको भोजन देने से, पर्यावरण का संतुलन बना रहता है।
और दूसरा, श्राद्ध में जो काले तिल, जौ, कुशा, तुलसी का उपयोग होता है, वे सब एंटी-बैक्टीरियल हैं, जो वर्षा ऋतु के बाद फैले रोगों से घर की रक्षा करते हैं।
इसलिए, भगवान का यह आदेश, केवल आध्यात्मिक नहीं, वैज्ञानिक भी है, कि पितरों के बहाने, मनुष्य, प्रकृति से जुड़े, और अपने घर को शुद्ध करे।
छठा अध्याय पितर आते हैं तो दिखते क्यों नहीं?
बहुत लोग पूछते हैं, यदि पितर धरती पर आते हैं, तो दिखते क्यों नहीं।
इसका उत्तर गरुड़ पुराण देता है – पितर, वायु रूप में आते हैं, सूक्ष्म शरीर में आते हैं, वे तुम्हें देखते हैं, पर तुम उन्हें नहीं देख सकते, जैसे हम हवा को नहीं देख सकते, पर महसूस कर सकते हैं। वे तुम्हारे दरवाजे पर, तुम्हारी दहलीज पर, 15 दिन तक बैठे रहते हैं, प्रतीक्षा करते हैं, कि मेरा पुत्र मुझे जल देगा, भोजन देगा।
जब तुम सुबह, दक्षिण दिशा की ओर मुख करके, काले तिल के साथ जल देते हो, और कहते हो, *”मेरे पिता, दादा, परदादा, जो भी इस वंश में जन्मे, जो भी भूखे हैं, वे सभी इस जल से तृप्त हों”*, तो वह जल, सीधा उनके पास पहुंचता है, और वे तृप्त होकर, तुम्हें आशीर्वाद देते हैं, *”पुत्रवान भव, धनवान भव, आयुष्मान भव”।*
और यदि तुम उन्हें भूल जाते हो, तो वे 15 दिन के बाद, अमावस्या के दिन, निराश होकर, एक लंबी सांस लेकर कहते हैं, *”हाय, मेरे वंश ने मुझे भुला दिया”*, और वे वापस चले जाते हैं। और उस घर में, पितृदोष लग जाता है।
इसलिए, शास्त्र कहता है, पितृपक्ष में कभी भी, घर के द्वार पर आए हुए किसी भी भूखे को, गाय को, कुत्ते को, कौए को, ब्राह्मण को, खाली हाथ मत जाने दो, हो सकता है, उसी रूप में, तुम्हारा पितर, तुम्हारे द्वार पर आया हो, तुम्हारी परीक्षा लेने।
सातवां अध्याय अंतिम निष्कर्ष – भगवान आदेश क्यों देते हैं?
तो अब प्रश्न का अंतिम उत्तर….
भगवान पितरों को धरती पर जाने का आदेश, दया से देते हैं, करुणा से देते हैं, तीन कारणों से देते हैं –
1. पितरों के कल्याण के लिए…
ताकि वे भूखे-प्यासे न रहें, उन्हें भोजन मिले, जल मिले, और उन्हें मुक्ति मिले।
2. मनुष्यों के कल्याण के लिए…
ताकि मनुष्य, अपने पितृ ऋण से मुक्त हो सके, उसे पितरों का आशीर्वाद मिले, उसके वंश की वृद्धि हो, और वह अहंकार न करे, कि यह सब मैंने कमाया है, बल्कि वह याद रखे, यह सब मेरे पितरों ने दिया है।
3. सृष्टि के संतुलन के लिए….
ताकि देवता, मनुष्य और पितर, तीनों में संबंध बना रहे, आदान-प्रदान चलता रहे। देवता हमें देते हैं, हम पितरों को देते हैं, और पितर हमें आशीर्वाद देते हैं, यही सृष्टि का चक्र है।
इसीलिए, पितृपक्ष, शोक का पक्ष नहीं, श्रद्धा का पक्ष है, यह रोने का समय नहीं, यह अपने पितरों को याद करके, कृतज्ञता व्यक्त करने का समय है। जैसे हम अपने जीवित माता-पिता की सेवा करते हैं, वैसे ही, इन 15 दिनों में, हम अपने दिवंगत माता-पिता की, भावना से सेवा करते हैं।
और जो मनुष्य, श्रद्धा से, अपने पितरों को जल देता है, वह कभी भी दरिद्र नहीं होता, कभी भी अकेला नहीं होता, क्योंकि उसके पीछे, उसके पितरों का पूरा आशीर्वाद, एक अदृश्य कवच की तरह, सदा उसकी रक्षा करता है।
इसलिए, इस पितृपक्ष, जब 26 सितंबर से 10 अक्टूबर तक, आपके पितर आपके द्वार पर आएं, तो उन्हें निराश मत लौटाइएगा, एक लोटा जल, एक रोटी, एक दिया, और दो हाथ जोड़कर, बस इतना कह दीजिएगा – *”हे पितरों, आप तृप्त हों, आप प्रसन्न हों, आपका आशीर्वाद सदा हम पर बना रहे।”
आपका इतना सा भाव, आपके पितरों को मुक्ति दे देगा, और आपको, उनके अनंत आशीर्वाद से भर देगा।
॥ सर्वे पितरः प्रीयन्ताम्, तृप्यन्ताम्, आशीर्वादं ददतु ॥
(संकलन – प्रीति चौहान)

