
नर्मदापुरम / शिक्षकों की प्रथम नियुक्ति दिनांक से सेवा गणना से जुड़े मामले में राज्य शासन को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगने के बाद हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा शासन की विशेष अनुमति याचिका खारिज किए जाने के बाद, हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि अब शिक्षकों के पक्ष में पारित आदेश का पालन करना अनिवार्य होगा। माननीय न्यायमूर्ति दीपक खोत की एकलपीठ में राजेश कुमार पाण्डेय एवं अन्य द्वारा दायर न्यायालय अवमानना याचिका CONC-3545/2026 विरुद्ध श्रीमती रश्मि अरुण शमी एवं अन्य पर सुनवाई हुई। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता जितेन्द्र आर्य एवं शासन की ओर से शासकीय अधिवक्ता ए. एस. बघेल उपस्थित हुए। सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि शासन ने मूल आदेश पर रोक लगवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एस एल पी (Civil) No. 35084/2026 दायर की थी, जिसे सर्वोच्च अदालत ने 24 अगस्त 2026 को खारिज कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट से राहत न मिलने के बाद सरकारी अधिवक्ता ने हाई कोर्ट के समक्ष आदेश के पूर्ण पालन के लिए 4 सप्ताह की मोहलत मांगी। अदालत ने शासन के अनुरोध को स्वीकार करते हुए अंतिम अवसर दिया और मामले की अगली सुनवाई 21 अक्टूबर 2026 से प्रारंभ होने वाले सप्ताह में तय की है। फैसले के प्रमुख बिंदु और प्रभाव: सुप्रीम कोर्ट की मुहर: शासन की एस एल पी खारिज होने से हाई कोर्ट का मूल आदेश पूरी तरह अंतिम और बाध्यकारी हो चुका है।
बहानेबाजी पर पूर्णविराम…
अब स्कूल शिक्षा विभाग कानूनी अड़चनों का हवाला देकर शिक्षकों की वरिष्ठता व सेवा गणना का लाभ नहीं रोक सकेगा।
21 अक्टूबर तक पालन अनिवार्य….
शासन को तय समय सीमा के भीतर अनुपालन आदेश जारी कर अदालत में प्रस्तुत करना होगा, अन्यथा अवमानना की गंभीर कार्रवाई तय है। इस निर्णय से प्रदेश के हजारों समान मामलों वाले शिक्षकों के लिए भी प्रथम नियुक्ति तिथि से वरिष्ठता और संबंधित लाभों का मार्ग प्रशस्त हो गया है।

