
नर्मदापुरम / जिला पंजीयन कार्यालय में ऑनलाइन व्यवस्था की तकनीकी गड़बड़ी और जिम्मेदार अधिकारियों की कथित उदासीनता का बड़ा मामला सामने आया है। आरटीआई के जरिए सामने आई जानकारी के अनुसार जिले में 153 सर्विस प्रोवाइडरों की मौजूदगी है, इनमें से अधिकतर सर्विस प्रोवाइडर की 39 लाख 39 हजार 927 रुपये की राशि करीब पांच साल तक सरकारी खाते में अटकी रही। इस दौरान अधिकारी आते-जाते रहे, लेकिन फंसी रकम को वापस दिलाने की दिशा में प्रभावी कार्रवाई नहीं हो सकी। यह मामला आरटीआई कार्यकर्ता बी. एल. श्रीवास्तव द्वारा सूचना के अधिकार के तहत की गई अपील के बाद सामने आया। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक 15 मार्च 2021 से 19 दिसंबर 2025 के बीच ऑनलाइन ड्यूटी भुगतान में तकनीकी त्रुटि के चलते यह राशि फंस गई थी।
ऑनलाइन सिस्टम, फिर भी पांच साल तक अटका रहा पैसा….
ऑनलाइन स्टांप शुल्क से संबंधित ऐसी त्रुटिपूर्ण अथवा फंसी हुई राशि में से निर्धारित 2 प्रतिशत शासकीय शुल्क काटकर शेष राशि सर्विस प्रोवाइडर को वापस किए जाने का प्रावधान है। यही नियम अब पूरे मामले को और गंभीर बना रहा है। सवाल यह है कि जब विभाग के पास ऑनलाइन रिकॉर्ड मौजूद था और रकम सिस्टम में दिखाई दे रही थी, तो जिम्मेदार अधिकारियों ने समय रहते संबंधित सर्विस प्रोवाइडरों को सूचना देकर उनकी राशि वापस कराने की पहल क्यों नहीं की?
अफसर बदले, फाइल वहीं की वहीं….
जानकारी के अनुसार इन करीब पांच वर्षों में जिला पंजीयन कार्यालय में चार से पांच अधिकारी बदले, लेकिन सर्विस प्रोवाइडरों की अटकी रकम का मामला जस का तस बना रहा। इस अवधि में कुछ अधिकारी स्थानांतरित हुए तो कुछ सेवानिवृत्त भी हुए। बावजूद इसके लाखों रुपये की इस राशि को लेकर अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाई गई। खामियाजा उन सर्विस प्रोवाइडरों को भुगतना पड़ा, जिनकी मेहनत की कमाई तकनीकी गड़बड़ी और विभागीय प्रक्रिया के बीच उलझी रही। कुछ राशि के राजकोष में चले जाने की बात भी सामने आई है।
अब नए अधिकारी ने दिखाई तेजी…..
मामला सामने आने के बाद वर्तमान जिला पंजीयन अधिकारी ने इस लंबित प्रकरण को तेजी से निपटाने की पहल की है। बताया गया है कि उनके कार्यकाल के शुरुआती एक महीने में ही कई सर्विस प्रोवाइडरों की अटकी राशि वापस कराई जा चुकी है। पूर्व अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर टिप्पणी करने से वर्तमान अधिकारी उपेंद्र कुमार झा ने बचते हुए अपनी ओर से लंबित मामलों को जल्द से जल्द निपटाने की बात कही है। उनका कहना है कि यदि वे दोनों हाथों से लिख सकते तो काम को और तेजी से निपटाते। मामला 39.40 लाख रुपये की अटकी रकम का नहीं रह गया है, बल्कि जवाबदेही का सवाल बन गया है। जब विभाग के पास ऑनलाइन रिकॉर्ड था और रकम लंबे समय तक सरकारी खाते में पड़ी रही, तो पांच वर्षों तक इस पर ध्यान क्यों नहीं दिया गया?
आरटीआई कार्यकर्ता बी.एल. श्रीवास्तव के अनुसार सूचना के अधिकार से सामने आए आंकड़े विभागीय व्यवस्था की गंभीर खामियों की ओर इशारा करते हैं। अब जरूरत इस बात की है कि पूरे प्रकरण की जिम्मेदारी तय हो और यह भी स्पष्ट किया जाए कि जिन सर्विस प्रोवाइडरों की राशि समय सीमा के कारण राजकोष में चली गई, उनके हितों की रक्षा के लिए विभाग ने क्या कदम उठाए। ऑनलाइन स्टांप शुल्क भुगतान में तकनीकी त्रुटि अथवा राशि फंसने की स्थिति में निर्धारित अवधि के भीतर आवेदन करने पर 2 प्रतिशत शासकीय शुल्क काटकर शेष राशि सर्विस प्रोवाइडर को वापस किए जाने का प्रावधान है। निर्धारित समय में आवेदन नहीं होने पर राशि राजकोष में जमा हो जाती है।
इनका कहना है…
इस संबंध में निरीक्षक पंजीयन 94248-32570 और जिला पंजीयक 95848-28183 मोबाइल नंबर पर कांटेक्ट करने का प्रयास किया गया लेकिन इस संबंध में उनसे बात नहीं हो सकी।

