



नर्मदापुरम / शहर में निकल रही संस्कार कांवड़ यात्रा को लेकर श्रद्धालुओं में उत्साह स्वाभाविक है। कांवड़ यात्रा हमारी धार्मिक आस्था और भगवान शिव के प्रति श्रद्धा से जुड़ी परंपरा है, लेकिन इस बार शहर के अधिकांश प्रमुख चौक-चौराहों पर लगे बड़े-बड़े बैनर, पोस्टर और प्रचार सामग्री देखकर एक सवाल जरूर उठ रहा है – आखिर इस यात्रा का मूल उद्देश्य क्या है?
यदि उद्देश्य धर्म, भक्ति, मां नर्मदा के संरक्षण और समाज को सकारात्मक संदेश देना है, तो उसका प्रभाव सेवा, स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण और धार्मिक संस्कारों के माध्यम से अधिक दिखाई देना चाहिए। लेकिन जब किसी धार्मिक आयोजन का प्रचार-प्रसार इतना प्रमुख हो जाए कि उसके पीछे का मूल संदेश ही गौण नजर आने लगे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
यह किसी की धार्मिक भावना पर सवाल नहीं, बल्कि धर्म के नाम पर होने वाले आयोजनों की दिशा और प्राथमिकताओं पर एक विचारणीय प्रश्न है। लाखों रुपये के प्रचार और बड़े जमावड़े के बजाय यदि यही ऊर्जा मां नर्मदा की स्वच्छता, पौधरोपण, गौसेवा, जरूरतमंदों की सहायता और शहर की अन्य जनसेवा में लगाई जाए तो कांवड़ यात्रा का संदेश और अधिक प्रभावी हो सकता है।
आस्था अपनी जगह है, लेकिन सवाल यह है कि यात्रा खत्म होने के बाद समाज के लिए क्या स्थायी संदेश और बदलाव पीछे छूटता है? यही इस भव्य आयोजन का सबसे बड़ा सवाल है।

