दयाराम फौजदार रिपोर्टर राज एक्सप्रेस नर्मदापुरम।
15 अगस्त हमारे राष्ट्रीय जीवन का वह पावन दिवस है, जब भारत ने सदियों की पराधीनता की बेड़ियां तोड़कर स्वतंत्रता के खुले आकाश में नई यात्रा का शुभारंभ किया था। 15 अगस्त 1947 केवल सत्ता हस्तांतरण का दिन नहीं था, बल्कि यह भारत की आत्मा के पुनर्जागरण, स्वाभिमान की पुनर्प्रतिष्ठा और एक नए राष्ट्र के निर्माण के संकल्प का दिन था। आज स्वतंत्रता के 79 वर्ष पूर्ण होने पर हम उस गौरवशाली यात्रा को स्मरण करते हैं, जिसने भारत को संघर्षों, चुनौतियों और उपलब्धियों के अनेक पड़ावों से होते हुए विश्व के अग्रणी राष्ट्रों की पंक्ति में प्रतिष्ठित किया है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत के सामने चुनौतियों का अंबार था।गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा, बेरोजगारी, आर्थिक विषमता, कमजोर स्वास्थ्य एवं शिक्षा व्यवस्था और सीमित संसाधनों के बीच राष्ट्र निर्माण की कठिन यात्रा शुरू हुई। यह वह भारत था जिसे वर्षों की औपनिवेशिक व्यवस्था ने आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर कर दिया था। लेकिन भारत की शक्ति उसके संसाधनों में नहीं, बल्कि उसके लोगों के संकल्प, श्रम, प्रतिभा और अदम्य इच्छाशक्ति में थी। यही शक्ति धीरे-धीरे राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी बनी।
आज 79 वर्ष बाद जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो उपलब्धियों की एक विराट गाथा हमारे सामने दिखाई देती है। कभी खाद्यान्न के संकट से जूझने वाला भारत आज कृषि उत्पादन में आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ते हुए दुनिया के अनेक देशों की खाद्य आवश्यकताओं में योगदान देने की क्षमता रखता है। विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में भारत ने वैश्विक पहचान बनाई है। आईआईटी, आईआईएम, एम्स, इसरो, डीआरडीओ और आईसीएमआर जैसे संस्थानों ने देश की बौद्धिक एवं वैज्ञानिक क्षमता को नई ऊंचाइयां प्रदान की हैं। परमाणु शक्ति से लेकर अंतरिक्ष विज्ञान तक, डिजिटल क्रांति से लेकर स्टार्टअप संस्कृति तक और खेलों से लेकर कला-संस्कृति तक भारत की प्रतिभा का प्रभाव विश्वभर में दिखाई दे रहा है।
चंद्रयान-3 की सफलता ने अंतरिक्ष विज्ञान में भारत की क्षमता का विश्व को परिचय कराया। कोविड-19 महामारी के कठिन दौर में भारत ने वैक्सीन निर्माण और दुनिया के अनेक देशों तक वैक्सीन एवं चिकित्सा सहायता पहुंचाकर मानवता के प्रति अपनी जिम्मेदारी का परिचय दिया। भारत का वैश्विक प्रभाव केवल आर्थिक शक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि वह मानवीय सहयोग, शांति, पर्यावरण संरक्षण और वैश्विक कल्याण की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
आज भारत विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रहा है। यह उपलब्धि केवल आर्थिक आंकड़ा नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों के परिश्रम, उद्यमिता, नवाचार और आत्मविश्वास का परिणाम है। देश की युवा शक्ति नए स्टार्टअप खड़े कर रही है, खेलों में विश्वस्तरीय प्रदर्शन कर रही है, विज्ञान एवं अनुसंधान में नए आयाम स्थापित कर रही है और वैश्विक स्तर पर भारतीय प्रतिभा का परचम लहरा रही है।
राष्ट्र की प्रगति के साथ उसकी सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। भारतीय सेना ने अपने शौर्य, पराक्रम और अनुशासन से सदैव देश की सीमाओं की रक्षा की है। आतंकवाद के विरुद्ध भारत का दृढ़ रुख और निर्णायक कार्रवाई यह संदेश देती है कि भारत शांति और प्रगति का पक्षधर है, लेकिन अपनी संप्रभुता, सुरक्षा और नागरिकों की रक्षा के लिए किसी भी चुनौती का दृढ़ता से सामना करने में सक्षम है। भारत की नीति विकास और सहअस्तित्व की है, लेकिन राष्ट्र की सुरक्षा और सम्मान से कोई समझौता नहीं हो सकता।
आजादी का अर्थ केवल स्वतंत्र होना नहीं, बल्कि स्वतंत्रता के मूल्यों को निरंतर मजबूत करना भी है। इसी भावना के साथ भारत ने लोकतंत्र, संविधान और विविधता में एकता के अपने मूल आदर्शों को अक्षुण्ण रखा है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना का पहला वाक्य—“हम, भारत के लोग”—हमारी लोकतांत्रिक शक्ति और राष्ट्रीय संप्रभुता का सबसे सशक्त उद्घोष है। यह हमें याद दिलाता है कि राष्ट्र निर्माण केवल सरकारों का दायित्व नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की सहभागिता और जिम्मेदारी से पूर्ण होता है।
स्वतंत्रता की इस गौरवशाली यात्रा में हमें अपने स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदानों को भी स्मरण रखना होगा। जलियांवाला बाग की पीड़ा से लेकर असंख्य ज्ञात-अज्ञात क्रांतिकारियों के त्याग तक, स्वतंत्रता की कहानी अनगिनत बलिदानों से लिखी गई है। उन वीरों ने जिस भारत का सपना देखा था, वह केवल राजनीतिक रूप से स्वतंत्र भारत नहीं था, बल्कि ऐसा भारत था जो आत्मनिर्भर, समतामूलक, शिक्षित, समृद्ध और मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण हो।
इसी राष्ट्रीय यात्रा का एक सुंदर अध्याय हमारा नर्मदापुरम भी है। मां नर्मदा के पावन तट पर बसा यह जिला अपनी प्राकृतिक संपदा, कृषि, सघन वनों, जैव विविधता, धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक परंपराओं और साहित्यिक-बौद्धिक चेतना के लिए विशिष्ट पहचान रखता है। नर्मदा के कछार से लेकर सतपुड़ा के वनांचल तक नर्मदापुरम प्रकृति और संस्कृति के अद्भुत समन्वय का प्रतीक है।
नर्मदापुरम की विशेषता यह है कि विकास और प्रकृति यहां एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि सहयोगी दिखाई देते हैं। कृषि, पर्यटन, शिक्षा, अधोसंरचना और जनसुविधाओं के विस्तार के साथ प्राकृतिक संपदा और पर्यावरण संरक्षण को महत्व देना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। मां नर्मदा केवल हमारी आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि हमारे जीवन, संस्कृति और अर्थव्यवस्था की आधारधारा भी है। इसलिए विकास की हर पहल में पर्यावरणीय संतुलन और आने वाली पीढ़ियों के हितों को ध्यान में रखना हमारा दायित्व है।
आज जब पूरा विश्व जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है, तब भारत की प्राचीन जीवन दृष्टि—प्रकृति के साथ सहअस्तित्व—पूरी मानवता को नई दिशा दे सकती है। नर्मदापुरम इस विचार का जीवंत उदाहरण बन सकता है कि विकास की गति और प्रकृति की गरिमा को साथ लेकर चला जा सकता है।
स्वतंत्रता के 79 वर्षों की उपलब्धियां हमें गौरवान्वित करती हैं, लेकिन हमें इन उपलब्धियों पर ठहरना नहीं है। हमारे सामने अगला बड़ा लक्ष्य भारत को वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र के रूप में स्थापित करना है। यह केवल सरकार का लक्ष्य नहीं, बल्कि 140 करोड़ से अधिक भारतीयों का सामूहिक संकल्प है। विकसित भारत का अर्थ केवल मजबूत अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि ऐसा राष्ट्र है जहां हर नागरिक को सम्मान, अवसर, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य, सुरक्षित वातावरण और विकास में समान भागीदारी प्राप्त हो।
समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुंचाना, महिलाओं को आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त बनाना, युवाओं की प्रतिभा को अवसर देना, किसानों की समृद्धि सुनिश्चित करना, शिक्षा एवं स्वास्थ्य की गुणवत्ता बढ़ाना और प्रकृति के संरक्षण के साथ विकास को गति देना—यही विकसित भारत की वास्तविक आधारशिला है।
आजादी के अमृतकाल में हमें अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी स्मरण करना होगा। राष्ट्र के प्रति निष्ठा, संविधान के प्रति सम्मान, पर्यावरण की रक्षा, सामाजिक सद्भाव, सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा, कानून का पालन और अपने कार्यक्षेत्र में उत्कृष्टता के लिए निरंतर प्रयास—ये ऐसे छोटे-छोटे संकल्प हैं जो मिलकर एक महान राष्ट्र का निर्माण करते हैं।
आइए, स्वतंत्रता दिवस के इस पावन अवसर पर हम उन ज्ञात-अज्ञात वीरों को नमन करें, जिनके त्याग से हमें स्वतंत्र भारत मिला। अपनी उपलब्धियों पर गर्व करें, अपनी कमियों को दूर करने का संकल्प लें और आने वाली पीढ़ियों के लिए ऐसा भारत बनाने में योगदान दें, जिस पर हर भारतीय गर्व कर सके।
भारत की स्वतंत्रता हमारी विरासत है, भारत की उपलब्धियां हमारा गौरव हैं और विकसित भारत हमारा संकल्प।
मां नर्मदा की पावन धारा की तरह भारत की विकास यात्रा भी अनवरत प्रवाहित होती रहे—नई ऊर्जा, नए संकल्प और नई उपलब्धियों के साथ।
आइए, हम सब मिलकर राष्ट्र निर्माण की इस महान यात्रा में अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान दें।
जय हिंद!
वंदे मातरम्!

