
नर्मदापुरम / शासकीय जिला चिकित्सालय अपनी बदहाल कार्यप्रणाली और अव्यवस्थाओं को लेकर एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार मामला अस्पताल की जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र शाखा से जुड़ा है, जहाँ प्रमाण पत्र बनवाने आ रहे आम नागरिक भ्रष्टाचार और लेट-लतीफी से बेहद परेशान हैं। बिना ‘सुविधा शुल्क’ नहीं बनते प्रमाण पत्र स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि नवजात बच्चों के जन्म प्रमाण पत्र हों या किसी परिजन के मृत्यु प्रमाण पत्र, बिना रुपये (रिश्वत) दिए कागजात आगे नहीं बढ़ते। हाल ही में इस लेनदेन से जुड़ा एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हुआ था, जिसने अस्पताल प्रशासन की पोल खोलकर रख दी। वीडियो वायरल होने के बाद जनसामान्य में भारी आक्रोश और बवाल देखने को मिला, लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि अस्पताल प्रबंधन ने अब तक दोषी कर्मचारियों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है।
नर्सिंग पद का कर्मचारी कैसे चला रहा है बाबूगिरी….
इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला और गंभीर पहलू पदस्थापना का है। सूत्रों और प्राप्त जानकारी के अनुसार मूल पद जन्म-मृत्यु शाखा का कामकाज संभाल रहे रविंद्र चौकंडे का मूल पद नर्सिंग कैडर (स्वास्थ्य सेवा) का है। नियमों की अनदेखी जिस कर्मचारी का मुख्य दायित्व मरीजों की देखभाल और नर्सिंग सेवा देना है, उससे दफ्तर की लिखा-पढ़ी और ‘बाबू’ (लिपिक) का काम कराया जा रहा है। प्रशासनिक शह एक स्वास्थ्य कर्मी किस नियम और किसके आदेश से दफ्तरी काम कर रहा है, यह अपने आप में बड़ा सवाल है। गंभीर जांच का विषय आखिर किसके मौखिक या लिखित आदेश पर एक नर्सिंग स्टाफ को जन्म-मृत्यु शाखा का प्रभार सौंपा गया? क्या यह केवल व्यक्तिगत पसंद का मामला है या इसके पीछे कोई बड़ा प्रशासनिक संरक्षण खेल रहा है?
जनहित में जांच और कार्रवाई की मांग अस्पताल जैसे संवेदनशील स्थान पर इस प्रकार की मनमानी से स्वास्थ्य सेवाएँ तो प्रभावित हो ही रही हैं, साथ ही प्रमाण पत्र के लिए भटक रहे गरीब और आम नागरिकों का शोषण भी हो रहा है। क्षेत्रीय नागरिकों ने जिला प्रशासन, कलेक्टर एवं मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी से मांग की है कि वायरल वीडियो की निष्पक्ष जांच कर दोषी पर तुरंत दंडात्मक कार्रवाई की जाए एवं कर्मचारियों को तत्काल मूल पदस्थापना (नर्सिंग) में भेजा जाए। यह उजागर किया जाए कि रविंद्र चौकंडे को किस अधिकारी के संरक्षण में बाबू बनाया गया था।

