

नर्मदापुरम / सिंधी भाषी लेखिका रेखा रतनानी ‘शिवनंदनी’ ने अपनी प्रथम हिंदी कृति “नर्मदापुर से नर्मदापुरम तक” के माध्यम से नगर के ऐतिहासिक सफर, वर्तमान परिस्थितियों और भविष्य की संभावनाओं को एक सूत्र में पिरोने का प्रयास किया है। इस पुस्तक में नर्मदापुरम (पूर्व होशंगाबाद) की ऐतिहासिक घटनाओं, प्रमुख व्यक्तित्वों और सांस्कृतिक महत्व का विस्तृत संकलन किया गया है। पुस्तक की प्रमुख बातें और ऐतिहासिक संदर्भ नामकरण का इतिहास (1435 से 2021 तक) 1435 से पूर्व यह आवासीय क्षेत्र मूल रूप से नर्मदापुर’ के नाम से जाना जाता था। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वर्ष 1403 में दिल्ली के शासक फिरोज तुगलक का सूबेदार दिलावर खाँ गौरी मालवा के स्वतंत्र राज्य का शासक बना। बाद में दिलावर खाँ के पुत्र अल्पखाँ (होशंगशाह गौरी) ने उसकी हत्या कर सत्ता संभाली।
होशंगाबाद नामकरण वर्ष 1435 में होशंगशाह गौरी की मृत्यु के पश्चात इस सूबे का नाम बदलकर होशंगाबाद’ रखा गया।नर्मदापुरम नाम पुनर्स्थापित राज्य सरकार ने 19 फरवरी 2021 को ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए होशंगाबाद का नाम बदलकर पूर्व नाम ‘नर्मदापुर’ में ‘म’ जोड़कर ‘नर्मदापुरम’ कर दिया। नगर का ‘लघु गज़ेटियर’ साहित्य जगत के विद्वानों द्वारा इस कृति को नगर के ऐतिहासिक और सामाजिक विवरणों के आधार पर ‘लघु गज़ेटियर’ (Mini Gazetteer) के रूप में स्वीकार किया गया है। समीक्षात्मक पहलू पुस्तक में लेखिका ने ‘सूत्रों की आवाज’ को आधार बनाया है। यद्यपि साहित्यकारों ने इसे ‘लघु गज़ेटियर’ का दर्जा दिया है, लेकिन समीक्षा में यह बात भी सामने आती है कि किन विशिष्ट विद्वानों ने यह स्वीकारोक्ति दी है, उनका स्पष्ट नामोल्लेख न होने से वे विद्वान भी ‘सूत्र’ तक ही सीमित रह जाते हैं।

