
नर्मदापुरम / हिंदू धर्म में आशा दशमी (आस माता) का व्रत अत्यंत फलदायी माना जाता है। यह व्रत मनोकामनाओं की पूर्ति, सुख-समृद्धि और पारिवारिक खुशहाली के लिए रखा जाता है। इस दिन माता की पूजा करके व्रत कथा का पाठ किया जाता है।
आशा दशमी व्रत कथा
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पौराणिक मान्यताओं और कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में निषध देश में राजा नल का राज्य था। राजा नल बहुत ही प्रतापी और दानी थे, लेकिन जुए (द्यूत क्रीड़ा) में हार जाने के कारण उनका सब कुछ छिन गया।राज्य हारने के बाद राजा नल अपनी पत्नी दमयंती के साथ जंगलों में भटकने लगे। विकट परिस्थितियों और दरिद्रता के कारण उनका जीवन कष्टों से भर गया। राजा नल के राज्य छिन जाने से रानी दमयंती बहुत चिंतित रहती थीं। दुखों से मुक्ति पाने और अपने खोए हुए सौभाग्य को वापस पाने के लिए, रानी दमयंती ने पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ आशा दशमी (आस माता) का व्रत रखा।उन्होंने पूरी निष्ठा से व्रत का पालन किया और माता से अपने पति व परिवार के अच्छे दिन लौटने की प्रार्थना की। माता की कृपा और व्रत के प्रभाव से उनके दुख के दिन धीरे-धीरे समाप्त होने लगे। उन्हें रास्ते में पुनः अपना राज्य वापस मिला और राजा नल की खोई हुई प्रतिष्ठा व संपत्ति भी लौट आई। इसी तरह आशा दशमी का व्रत करने से भक्तों के सभी संकट दूर होते हैं और उनकी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
व्रत के मुख्य नियम व पूजाविधि
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पूजा विधि: इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें। इसके बाद माता के समक्ष दीपक जलाएं, उन्हें फल, फूल और नैवेद्य अर्पित करें।
कथा श्रवण: पूजा के दौरान कथा का पाठ करें या सुनें और माता से सुख-शांति की प्रार्थना करें।
नियम: व्रत के दौरान सच्चे मन से ईश्वर का ध्यान करें। शाम को पूजा करने के बाद फलाहार (या एक समय सात्विक भोजन) करें।
यह व्रत छह महीने, एक साल या दो साल तक संकल्प लेकर किया जा सकता है।
दान: व्रत के पूर्ण होने पर ब्राह्मणों और जरूरतमंदों को दान-दक्षिणा देने का विधान है। (संकलन – प्रीति चौहान)

