
नर्मदापुरम / प्रज्ञा प्रवाह के अंतर्गत नर्मदा एजुकेशन सोसायटी कॉलेज ऑफ एजुकेशन, नर्मदापुरम एवं पंडित रामलाल शर्मा कॉलेज ऑफ एजुकेशन, नर्मदापुरम के संयुक्त तत्वावधान में विनायक दामोदर सावरकर “वीर सावरकर” द्वारा रचित प्रसिद्ध ग्रंथ “1857 का स्वातंत्र्य समर” पर एक विचारगर्भित परिचर्चा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों एवं शिक्षकों को भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को राष्ट्रवादी दृष्टिकोण से समझने का अवसर प्रदान करना था। कार्यक्रम में दोनों महाविद्यालयों के प्राध्यापकगण, कर्मचारीगण एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। प्रज्ञा प्रवाह देशभर में भारतीय ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक चिंतन और राष्ट्रीय विमर्श से जुड़े कार्यक्रमों का आयोजन करता है।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सदानंद सप्रे, प्रज्ञा प्रवाह संगठन के अखिल राष्ट्रीय स्तर के प्रतिनिधि, विशिष्ट अतिथि सुनील सिंह के रूप में प्रज्ञा प्रवाह के प्रांतीय स्तर प्रतिनिधि एवं विशिष्ट अतिथि धीरेंद्र चतुर्वेदी, विश्वविद्यालय कार्य परिषद के सदस्य एवं प्रज्ञा प्रवाह के प्रांतीय स्तरीय प्रतिनिधि उपस्थित रहे। कार्यक्रम में नर्मदा एजुकेशन सोसायटी कॉलेज ऑफ एजुकेशन, नर्मदापुरम के प्रबंधक अरुण शर्मा की विशेष गरिमामयी उपस्थिति रही।
कार्यक्रम की भूमिका प्रस्तुत करते हुए महाविद्यालय के उपप्राचार्य डॉ. संजय गर्गव ने कहा कि 1857 का स्वातंत्र्य समर भारतीय इतिहास की ऐसी महत्वपूर्ण घटना है, जिसने देश में स्वतंत्रता की चेतना को व्यापक स्वरूप प्रदान किया। उन्होंने कहा कि वीर सावरकर की यह पुस्तक केवल इतिहास का वर्णन नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्ति, स्वाभिमान और स्वतंत्रता के संकल्प का प्रेरक दस्तावेज है।
इसके पश्चात प्रज्ञा प्रवाह के सदस्य श्री संतोष व्यास ने कार्यक्रम का विस्तृत परिचय देते हुए संगठन के उद्देश्यों एवं गतिविधियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि प्रज्ञा प्रवाह भारतीय संस्कृति, इतिहास, शिक्षा एवं ज्ञान परंपरा पर आधारित वैचारिक संवाद को समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुंचाने का सतत प्रयास कर रहा है।
परिचर्चा के दौरान श्री लिनेंद्र चौधरी ने वीर सावरकर के विचारों का विस्तार से विवेचन करते हुए कहा कि सावरकर का चिंतन केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं था, बल्कि उसमें सांस्कृतिक पुनर्जागरण, राष्ट्रीय एकता, आत्मगौरव, कर्तव्यबोध एवं मातृभूमि के प्रति समर्पण का गहन संदेश निहित है। उन्होंने कहा कि सावरकर ने 1857 की क्रांति को भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में स्थापित कर भारतीय इतिहास लेखन को नई दिशा प्रदान की।
इस अवसर पर पंडित रामलाल शर्मा कॉलेज ऑफ एजुकेशन के प्राचार्य डॉ. प्रिंस जैन ने वीर सावरकर के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत करते हुए कहा कि वे केवल महान क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि दूरदर्शी इतिहासकार, प्रखर साहित्यकार एवं राष्ट्रवादी चिंतक भी थे। उन्होंने पुस्तक के प्रमुख बिंदुओं पर प्रकाश डालते हुए विद्यार्थियों से इतिहास के गहन अध्ययन का आह्वान किया।
मुख्य अतिथि श्री सनानंद सप्रे जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि 1857 का स्वातंत्र्य समर भारतीय राष्ट्रीय चेतना का प्रथम संगठित स्वर था। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक इसे केवल सैनिक विद्रोह के रूप में प्रस्तुत किया गया, जबकि यह विदेशी शासन के विरुद्ध व्यापक जनआंदोलन था, जिसमें समाज के विभिन्न वर्गों ने सहभागिता निभाई। उन्होंने विद्यार्थियों से आग्रह किया कि वे इतिहास को भारतीय दृष्टि से समझें तथा राष्ट्र निर्माण में अपनी सक्रिय भूमिका निभाएं।
कार्यक्रम में नर्मदा एजुकेशन सोसायटी कॉलेज ऑफ़ एजूकेशन के प्राचार्य डॉ. ज्योत्सना खरे के मार्गदर्शन में पूर्ण हुआ।
कार्यक्रम का प्रभावी एवं गरिमामय संचालन डॉ.आनंदमयी दुबे द्वारा किया गया। अंत में श्रीमती अंजू सक्सेना ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, प्राध्यापकों, कर्मचारियों एवं विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
परिचर्चा के समापन पर उपस्थित विद्यार्थियों ने पुस्तक से जुड़े विभिन्न विषयों पर अपने विचार साझा किए। कार्यक्रम में दोनों महाविद्यालयों के समस्त प्राध्यापकगण एवं छात्र-छात्राओं की सक्रिय उपस्थिति रही। यह परिचर्चा भारतीय इतिहास, राष्ट्रवाद और स्वतंत्रता आंदोलन की सही ऐतिहासिक समझ विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल सिद्ध हुई।

