नर्मदापुरम / शासकीय गृहविज्ञान स्नातकोत्तर अग्रणी महाविद्यालय नर्मदापुरम में मानसिक स्वास्थ्य एवं कल्याण से संबंधित ऑफलाइन सेंसटाइजेशन कार्यक्रम आयोजित किया गया। जिसमें नर्मदापुरम संभाग के समस्त महाविद्यालय के प्राचार्य एवं नोडल अधिकारियों ने सहभागिता की। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि अतिरिक्त संचालक उच्च शिक्षा विभाग भोपाल नर्मदापुरम संभाग डॉ. मथुरा प्रसाद, विशिष्ट अतिथि निदेशक स्वामी विवेकानंद कॅरियर मार्गदर्शन प्रकोष्ठ डॉ. मनोज सिंह, डॉ. अशोक शर्मा, डॉ. श्रीमती कामिनी जैन, प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस के प्राचार्य डॉ. आर के चौकसे, श्रीमती चित्रा हर्णे, सुश्री रुचि अग्निहोत्री ने मंच पर अपनी गरिमामयी उपस्थिति दी। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन एवं सरस्वती पूजन से किया गया।
अतिरिक्त संचालक उच्च शिक्षा विभाग भोपाल नर्मदापुरम संभाग डॉ. मथुरा प्रसाद ने संबोधित करते हुए कहा कि ऑफलाइन संवेदनशीलता एक प्रत्यक्ष एवं सहभागिता पूर्ण प्रक्रिया है। जिसका उद्देश्य विद्यार्थियों, शिक्षकों एवं संस्थागत समुदाय में मानसिक स्वास्थ्य भावनात्मक कल्याण तथा सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति जागरूकता, सहानुभूति एवं संवेदनशीलता विकसित करना है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से संवेदनशीलता वह प्रक्रिया है। जिसमें व्यक्ति किसी महत्वपूर्ण अनुभव या परिस्थिति के प्रति अधिक सजग एवं प्रतिक्रियाशील हो जाता है। उच्च शिक्षा संस्थानों में यह केवल जागरूकता कार्यक्रम नहीं बल्कि मानसिक स्वास्थ्य संवर्धन एवं आत्महत्या रोकथाम का एक प्रभावी निवारक हस्तक्षेप है।
निदेशक स्वामी विवेकानंद कॅरियर मार्गदर्शन प्रकोष्ठ ने बताया कि संवेदन शीलता कार्यक्रम शिक्षकों, कर्मचारियों एवं सहपाठियों को गेटकीपर के रूप में प्रशिक्षित करते हैं, जिससे वे संकटग्रस्त विद्यार्थियों की प्रारंभिक पहचान कर समय रहते उचित सहायता उपलब्ध करा सें। यह दृष्टिकोण आत्महत्या रोकथाम को केवल व्यक्तिगत समस्या के रूप तें नहीं, बल्कि सामुदायिक एवं संस्थागत उत्तरदायित्व के रूप में देखने पर बल देता है।
डॉ. अशोक शर्मा ने मानसिक स्वास्थ्य का आध्यात्म से संबंध के बारे में बताया कि आध्यात्मिकता मानसिक परेशानियों को कम करने, भावनात्मक संतुलन एवं सकारात्मक सामाजिक संबंध में महत्वपूर्ण होती है।
महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. श्रीमती कामिनी जैन ने बताया कि संवेदीकरण ऑफलाइन मानसिक स्वास्थ्य के अंतर्गत लोगों को मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक संवेदनशील और समझदार बनाना है। ऑफलाइन मानसिक स्वास्थ्य संवेदीकरण के प्रमुख माध्यम कार्यशालाएं, सेमिनार आयोजित करना, नुक्कड़ नाटक, सांस्कृतिक कार्यक्रम, पोस्टर, पंपलेट, ब्रोशर, समूह चर्चा एवं परामर्श शिविर है। इनका उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े संदेशों का सरल प्रस्तुतीकरण है। शासन के निर्देशानुसार विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों के समाधान हेतु जिला स्तरीय निगरानी समिति का गठन किया गया, समिति की संरचना में कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक, आयुक्त नगर पालिका अधिकारी, मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत, सहायक आयुक्त आदिवासी विकास विभाग, मुख्य चिकित्सा अधिकारी, जिला कार्यक्रम अधिकारी महिला एवं बाल विकास विभाग, जिला शिक्षा अधिकारी स्कूल शिक्षा, चिकित्सा शिक्षा विभाग, तकनीकी शिक्षा विभाग, संयुक्त संचालक सामाजिक न्याय एवं निःशक्तजन कल्याण विभाग, नागरिक समाज के सदस्य श्रीमती चित्रा हर्णे एवं सुश्री रुचि अग्निहोत्री एवं प्राचार्य शासकीय गृहविज्ञान स्नातकोत्तर अग्रणी महाविद्यालय नर्मदापुरम उच्च शिक्षा विभाग को उत्तरदायित्व दिया गया।
कार्यक्रम की संयोजक डॉ. संगीता अहिरवार ने बताया कि मनोवैज्ञानिक शोध बताते है कि निरंतर शैक्षणिक दबाव, सामाजिक अलगाव, आर्थिक कठिनाइयां, भेदभाव, उत्पीड़न, प्रतिस्पर्धा तथा भविष्य की अनिश्चितता जैसे कारक विद्यार्थियों में तनाव और मनोवैज्ञानिक संकट को बढ़ा सकते है, ऐसी परिस्थितियों में ऑफलाइन संवेदनशीलता कार्यक्रम मानसिक स्वास्थ्य साक्षरता को बढ़ाने, मानसिक रोगों से जुड़ी समस्याओं को कम करने तथा सहायता प्राप्त करने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है।
कार्यक्रम के वक्ता डॉ रवि उपाध्याय ने बताया कि माइंडफुलनेसएक ऐसी मानसिक अभ्यास पद्धति है, जिसमें व्यक्ति वर्तमान क्षण पर बिना किसी निर्णय के पूर्ण जागरूकता के साथ ध्यान केंद्रित करता है। यह अभ्यास व्यक्ति को अपने विचारों, भावनाओं, शारीरिक संवेदनाओं और आसपास के वातावरण को स्वीकार करने और समझने में सहायता करता है। मानसिक स्वास्थ्य में माइंडफुलनेस का अत्यधिक महत्व है। इससे तनाव में कमी आती है,अवसाद की पुनरावृत्ति में कमी आती है, भावनात्मक संतुलन रहता है, एकाग्रता एवं स्मरण शक्ति में सुधार होता है एवं नियमित अभ्यास से सकारात्मक सोच, संतोष, आत्म-स्वीकृति और सामाजिक संबंधों में सुधार देखा गया है।
कार्यक्रम के विषय विशेषज्ञ डॉ कमल वाधवा ने बताया कि योग, ध्यान एवं प्राणायाम मानसिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ करने के प्रभावी, सुरक्षित और वैज्ञानिक उपाय माने जाते हैं। ये केवल मानसिक रोगों की रोकथाम में ही नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। योग शरीर, मन और आत्मा के बीच संतुलन स्थापित करने की एक समग्र पद्धति है। ध्यान मन को वर्तमान क्षण में केंद्रित करने की प्रक्रिया है। नियमित ध्यान मानसिक स्पष्टता और भावनात्मक स्थिरता प्रदान करता है।
विषय विशेषज्ञ डॉ. योगेश खंडेलवाल ने ’’बात करें, बोझ हल्का करें’’ पर एक महत्वपूर्ण मानसिक स्वास्थ्य संदेश बताया जो लोगों को अपनी भावनाओं, चिंताओं और समस्याओं को खुलकर साझा करने के लिए प्रेरित करता है। यह विचार इस सिद्धांत पर आधारित है कि मन की बात व्यक्त करने से मानसिक तनाव कम होता है, भावनात्मक संतुलन बेहतर होता है और व्यक्ति को आवश्यक सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक सहयोग प्राप्त होता है।
विषय विशेषज्ञ डॉ. बबीता राठौर ने आत्महत्या रोकथाम हेतु जागरूकता पर संबोधित करते हुए कहा कि आत्महत्या एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है, जिसे समय पर जागरूकता, संवेदनशील संवाद, सामाजिक सहयोग और उचित मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के माध्यम से काफी हद तक रोका जा सकता है। आत्महत्या के अधिकांश मामलों में व्यक्ति किसी न किसी प्रकार के मानसिक, सामाजिक, आर्थिक या व्यक्तिगत तनाव से जूझ रहा होता है। ऐसे समय में सही जानकारी, सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार और समय पर सहायता जीवन बचा सकती है।
कार्यक्रम में महाविद्यालयीन स्टॉफ में वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ. भारती दुबे, डॉ. श्रीकांत दुबे, डॉ. हर्षा चचाने, डॉ. कंचन ठाकुर, पूजा गोस्वामी उपस्थित रहे एवं आभार प्रदर्शन कार्यशाला की सचिव डॉ. रागिनी सिकरवार द्वारा किया गया। कार्यक्रम में एनएसएस की छात्राओं द्वारा सक्रिय योगदान दिया गया।

