

नर्मदापुरम / नगर पालिका चुनाव में अभी करीब एक साल का समय बचा है , लेकिन स्थानीय सियासी गलियारों में शह और मात का खेल शुरू हो चुका है। राज्य सरकार द्वारा इस बार नगर पालिका अध्यक्ष का चुनाव प्रत्यक्ष प्रणाली (जनता द्वारा सीधे) से कराए जाने के फैसले ने चुनाव की पूरी तासीर बदल दी है। इस फैसले के बाद अब पार्षदों की खुशामद और पार्षद खरीद-फरोख्त (हॉर्स ट्रेडिंग) की संभावनाओं पर पूरी तरह ब्रेक लगना तय माना जा रहा है। इस बीच, वर्तमान महिला अध्यक्ष के कार्यकाल के अंतिम वर्ष में अब इस सीट के ‘पुरुष सामान्य’ या ‘महिला सामान्य’ होने की प्रबल संभावना जताई जा रही है। सामान्य सीट के कयासों के बीच दावेदारों की एक लंबी कतार खड़ी हो गई है। कुछ नेताओं ने तो अभी से खुद को ‘भावी अध्यक्ष’ घोषित कर आकाओं की चौखट पर ‘गणेश परिक्रमा’ शुरू कर दी है।
टिकट वितरण का पारंपरिक त्रिकोण विधायक, संगठन और ‘ऑटो’ गुट नर्मदापुरम भाजपा की पारंपरिक राजनीति में संगठन के कड़े नियमों के बावजूद, टिकट वितरण में स्थानीय विधायक डॉ. सीताशरण शर्मा की अनुशंसा हमेशा से सर्वोपरि और निर्णायक रही है। विधायक और संगठन की आपसी सहमति के बाद ही अंतिम मोहर लगती है। लेकिन इस बार का पेंच दिलचस्प है। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी के लिए जिन नेताओं ने जमीन पर उतरकर जमकर ‘ऑटो’ (प्रचार रथ) चलाया था, वे खुद को टिकट की कतार में सबसे आगे मान रहे हैं। वहीं, विधानसभा चुनाव के दौरान विधायक के धुर विरोधी रहे गुट के लोग भी आज सत्ता के केंद्रों के आसपास मंडरा रहे हैं, जिससे यह चर्चा जोरों पर है कि इस बार नगर पालिका चुनाव में ‘ऑटो’ की सवारी कौन करेगा ।
दावेदारों की होड़, दिग्गज चेहरों और चौकसे बंधुओं पर टिकी निगाहें….
दावेदारों की इस लंबी सूची में कई मजबूत और जमीनी पकड़ वाले चेहरे सामने आ रहे हैं, जिससे मुकाबला बेहद दिलचस्प हो गया है। विधायक के बेहद करीबी माने जाने वाले भूपेंद्र चौकसे वर्तमान में ग्रामीण क्षेत्र की राजनीति का बड़ा चेहरा हैं, लेकिन उनकी नजर अब नर्मदापुरम नगर पालिका की कुर्सी पर है। वे शहरी मतदाता सूची में अपना नाम जुड़वाने के लिए हरसंभव प्रयास कर रहे हैं ताकि उनकी दावेदारी अकाट्य हो सके। महेंद्र चौकसे वे भी इस अवसर को हाथ से नहीं जाने देना चाहते। इसके साथ ही व्यापारी महासंघ के महासचिव मनोहर बडानी का नाम भी चल रहा है। हालांकि पिछले चुनाव में उनकी पत्नी वार्ड पार्षद का चुनाव हार गई थीं, जिससे उनकी दावेदारी को झटका लगा था, लेकिन इसके बावजूद वे इस बार रेस में पूरी मजबूती से बने हुए हैं। अभय वर्मा (नपा उपाध्यक्ष) नगर पालिका के वर्तमान उपाध्यक्ष होने के नाते शहर की राजनीति और परिषद के कामकाज पर इनकी मजबूत पकड़ है। इन्हें भी अध्यक्ष पद की रेस में एक प्रबल दावेदार माना जा रहा है। राजेश अत्रे (एल्डरमैन) अपनी प्रखर और निष्पक्ष छवि के लिए पहचाने जाने वाले राजेश अत्रे की दावेदारी को भी संगठन के भीतर गंभीरता से लिया जा रहा है। प्रमोद सोनी (पूर्व पार्षद) पूर्व पार्षद के रूप में शहर की जमीनी समस्याओं और वार्ड स्तर की राजनीति का लंबा अनुभव इनके पक्ष में जाता है। नीरजा फौजदार एक प्रखर समाजसेवी के रूप में जनता के बीच लगातार सक्रिय रहती हैं, अपनी मजबूत दावेदारी पेश कर रही हैं। आलोक शर्मा एक कट्टर हिंदूवादी चेहरे के रूप में उभरे हैं। माना जा रहा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघइस चेहरे पर दांव लगाने के लिए संगठन पर दबाव बना सकता है।
क्या नर्मदापुरम में चलेगा प्रदेश अध्यक्ष का ‘नो-रिपीट’ फॉर्मूला….
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के उस संगठनात्मक फरमान को लेकर है, जो उन्होंने अपने गृह क्षेत्र बैतूल में जारी किया है। क्या है बैतूल फॉर्मूला इस फॉर्मूले के तहत वर्तमान पार्षदों और उनके परिवार के किसी भी सदस्य को दोबारा पार्षद का टिकट नहीं दिया जाएगा; केवल नए और युवा चेहरों को मौका मिलेगा। अब सवाल यह है कि क्या यह ‘चमत्कार’ सिर्फ बैतूल तक सीमित रहेगा या नर्मदापुरम सहित पूरे प्रदेश में लागू होगा? यदि यह फॉर्मूला यहां लागू हुआ, तो कई स्थापित दिग्गजों और उनके परिजनों के राजनीतिक भविष्य पर संकट के बादल मंडरा सकते हैं, जिससे नए युवाओं के लिए रास्ते खुलेंगे।
महिलाओं की दावेदारी सामान्य सीट के मायने…..
चूंकि सीट के ‘सामान्य’ होने की पूरी संभावना है, इसलिए पिछड़ा वर्ग सहित सभी वर्गों की महिला दावेदार भी अंदर ही अंदर अपनी रणनीति मजबूत कर रही हैं। अब मुकाबला किसी बंद कमरे का नहीं, बल्कि सीधे जनता की अदालत का होगा। चुनाव में भले ही अभी समय है, लेकिन दावेदारों की लंबी सूची, भितरघात के अंदेशे और प्रत्यक्ष प्रणाली के नए नियमों ने नर्मदापुरम के सियासी पारे को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है। अब देखना यह है कि संगठन और विधायक की आपसी सहमति का यह ‘ऑटो’ किस दावेदार को अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंचाता है।

