


नर्मदापुरम / विश्व धरोहर दिवस, विरासतों के संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए समर्पित है। इतिहास के पन्नों में दर्ज इन धरोहरों में बीते अतीत की कहानियां छपी हैं। भारत के मानचित्र के मध्य में बसा मध्य प्रदेश केवल भौगोलिक रूप से ही “हार्ट ऑफ इंडिया” नहीं है, बल्कि इसकी आत्मा में इतिहास की गहरी धड़कन बसती है। सदियों से यहां राजाओं की महत्वाकांक्षाएं, धर्म और दर्शन के विचार और साधना की शांति एक साथ बहती रही है।
आइए मध्य प्रदेश की उन वादियों की सैर करें जहाँ इतिहास आपकी हर धड़कन के साथ सांस लेता है। क्योंकि भारत का एकमात्र हीरा उत्पादक राज्य अपने गर्भ में केवल चमकते पत्थरों से कहीं बढ़कर अनमोल रत्न समेटे हुए है।
दुनिया पहले से ही राज्य के 3 यूनेस्को-मान्यता प्राप्त अजूबों का जश्न मनाती है—खजुराहो के स्मारक समूह, जो अपनी नागर शैली के मंदिरों और मूर्तिकला के लिए प्रसिद्ध है। तो वहीं सांची के बौद्ध स्मारक, जहां बौद्ध वास्तुकला और दर्शन के प्रकाश स्तंभ के रूप में खड़ा है और भीमबेटका मानव रचनात्मकता की सबसे शुरुआती अभिव्यक्तियों को बयां करती है।
लेकिन इन विश्व-प्रसिद्ध प्रतीकों से परे, राज्य की 15 अन्य धरोहरें अब यूनेस्को की ‘अस्थायी सूची’ (Tentative List) में शामिल होकर दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच रही हैं।
सबसे पहले है भारत के सबसे भव्य किलों में से एक ग्वालियर का किला, जो विशाल संरचना, नीली टाइल्स वाले महल और सदियों पुराने मंदिर को अपने में समेटे हुए। फिर है रोमांस का शहर,मांडू, इसके महल झीलों और घाटियों के ऊपर सपनों की तरह तैरते नज़र आते हैं। वहीं चंदेरी में बारीकी से उकेरी गई बावड़ियों की संरचना शिल्प कौशल और इंजीनियरिंग की एक भूली हुई दुनिया को उजागर करती हैं। बेतवा नदी के किनारे बसी राजा राम की नगरी ओरछा, एक चित्रित साम्राज्य की तरह प्रकट होती है। फिर है राजसी और रहस्यमय अधूरा भोजेश्वर मंदिर, इसे देखकर ऐसा लगता है मानो इसे किसी विशालकाय शक्ति ने यूं ही अधूरा छोड़ दिया हो।
यूनेस्को की अस्थायी सूची में ये अनूठे स्थल भी शामिल हैं:
जबलपुर का भेड़ाघाट-लम्हेटाघाट
चंबल घाटी की रॉक आर्ट साइट
सतधारा के बौद्ध स्मारक
कुंडी भंडारा, बुरहानपुर
चौंसठ योगिनी मंदिर का रहस्यमय वास्तुशिल्प
गोंड स्मारक, मंडला, रामनगर
मंदसौर के धमनार की गुफाएं
मौर्य कालीन अशोक के शिलालेख
गुप्तकालीन मंदिर: सांची, उदयगिरि, नचना, तिगवा, भूमरा, सकोर, देवरी और पवाया में स्थित
बुंदेला काल के किला-महल
विरासत से विकास की ओर: नई परियोजनाएँ….
इन विरासतों के विस्तार के लिए मध्य प्रदेश पर्यटन बोर्ड (MPTB) ने हेरिटेज सर्किट, बेहतर पर्यटक सुविधाओं और संरक्षण पहलों पर काम कर रही है। इससे पर्यटकों का अनुभव करने का नज़रिया पूरी तरह बदल गया है।
मध्य प्रदेश पर्यटन बोर्ड और राज्य सरकार की नई पहलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि इतिहास को केवल किताबों में नहीं, बल्कि जीवंत अनुभवों के रूप में भी जिया जा सकता है।
अमरकंटक में ₹49.98 करोड़ की ‘प्रशाद योजना’ के तहत मंदिर परिसर, घाटों और प्रमुख स्थलों का विकास किया गया है। ग्वालियर किले के संरक्षण के लिए 10 वर्षीय परियोजना शुरू हुई है, जिसमें प्रकाश व्यवस्था, लैंडस्केपिंग और स्थानीय समुदाय के कौशल विकास पर कार्य होगा।
वहीं ग्वालियर के फूलबाग क्षेत्र को ‘स्वदेश दर्शन 2.0’ के तहत ₹16.72 करोड़ से विकसित किया जा रहा है, जहाँ ई-वाहन, फूड ज़ोन और प्रोजेक्शन मैपिंग जैसी सुविधाएँ होंगी। चित्रकूट में ₹27.21 करोड़ से घाटों, आरती प्लेटफॉर्म, डिजिटल रामायण और नाव विहार की व्यवस्था विकसित की जा रही है, जिससे लगभग 200 परिवारों को रोजगार मिलेगा। वहीं ओरछा और माण्डू को ‘स्वदेश दर्शन 2.0’ के तहत ₹24.99 करोड़ और ₹24.87 करोड़ से विकसित किया जा रहा है.
मध्य प्रदेश की विरासत उन पथों में भी जीवित है, जिन पर आस्था और संस्कृति सदियों से चलती रही है। राज्य ने ‘श्री राम वन गमन पथ’ हेरिटेज सर्किट की शुरुआत की है। यह सर्किट 9 जिलों में फैले 23 स्थलों को जोड़ता है और इसका केंद्र चित्रकूट तथा अमरकंटक हैं। यह केवल एक पर्यटन मार्ग नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और संस्कृति की यात्रा है। इन स्थानों पर भगवान राम के वनवास से जुड़ी कथाएँ, प्राचीन मंदिर, प्राकृतिक सौंदर्य और स्थानीय परंपराएँ एक साथ मिलती हैं।
इसका परिणाम मध्य प्रदेश का एक नया विजन है: यह अब केवल स्मारकों का संग्रह नहीं है, बल्कि एक ऐसी जगह है जहाँ इतिहास, संस्कृति और प्रकृति एक-दूसरे में गहराई से गुंथे हुए हैं।

