
नर्मदापुरम / शासकीय विधि महाविद्यालय में Sustainable Development Goals and Legal Framework विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य सतत विकास के लक्ष्यों की प्राप्ति में विधिक प्रावधानों, बौद्धिक समाज तथा आम जनमानस की भूमिका को स्पष्ट करना था। कार्यशाला पाँच तकनीकी सत्रों में संपन्न हुई, जिसमें विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों ने अपने विचार व्यक्त किए। कार्यशाला का शुभारंभ सरस्वती पूजा अर्चना के साथ हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ महाविद्यालय की प्राचार्य डा. कल्पना भारद्वाज के स्वागत भाषण से हुआ। उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा कि सतत विकास आज वैश्विक आवश्यकता बन चुका है और इसके लिए पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक न्याय तथा आर्थिक संतुलन को साथ लेकर चलना आवश्यक है। उन्होंने विद्यार्थियों और शोधार्थियों से आग्रह किया कि वे विधि के माध्यम से सतत विकास के उद्देश्यों को समाज तक पहुँचाने में सक्रिय भूमिका निभाएँ। कार्यशाला की रूपरेखा एवं उद्देश्य इको क्लब के संयोजक शिवाकांत मौर्य ने प्रस्तुत किए। उन्होंने बताया कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित सतत विकास लक्ष्य (SDGs) केवल नीतिगत विषय नहीं हैं, बल्कि इनके सफल क्रियान्वयन के लिए विधिक संरचना, जनभागीदारी तथा जागरूकता अत्यंत आवश्यक है। प्रथम तकनीकी सत्र में डॉ. रवि उपाध्याय, प्रोफेसर, वनस्पति शास्त्र, शासकीय पीएमसीओई महाविद्यालय, नर्मदापुरम ने अपने वक्तव्य में सतत विकास की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि तथा पर्यावरणीय चुनौतियों का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन के कारण आज पर्यावरणीय संकट बढ़ रहा है, इसलिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण और पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखना समय की मांग है। द्वितीय सत्र में डॉ. जितेन्द्र कुमार गुप्ता, सहायक प्राध्यापक, विधि, शासकीय राज्य स्तरीय विधि महाविद्यालय, भोपाल ने कहा कि बुद्धिजीवी वर्ग समाज को दिशा देने का कार्य करता है। उन्होंने कहा कि सतत विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने में शिक्षकों, शोधार्थियों तथा विद्यार्थियों की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि विधिक जागरूकता और नीतिगत सुधारों के माध्यम से ही इन लक्ष्यों को प्रभावी रूप से प्राप्त किया जा सकता है। तृतीय सत्र में अरविन्द दांगी, लॉ ऑफिसर, साइबर सेल, गृह विभाग भोपाल ने अपने वक्तव्य में कहा कि सतत विकास केवल सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि आम जनमानस की सक्रिय भागीदारी से ही यह संभव है। उन्होंने डिजिटल माध्यमों और तकनीकी नवाचारों के माध्यम से जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया। चतुर्थ सत्र में डॉ. अभिषेक सिंह ने सतत विकास के लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए भारत में प्रावधानित विभिन्न विधिक व्यवस्थाओं एवं नीतियों की जानकारी दी। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण से संबंधित विधानों और न्यायालयों की भूमिका को भी विस्तार से समझाया। पंचम सत्र में डॉ. महेंद्र कुमार पटेल ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि इतिहास हमें यह सिखाता है कि जब भी मानव ने प्रकृति के साथ असंतुलन किया है, उसके गंभीर परिणाम सामने आए हैं। इसलिए इतिहास से सबक लेते हुए हमें भविष्य के लिए ऐसी विकास नीति अपनानी चाहिए जो पर्यावरण, समाज और अर्थव्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखे। राजदीप भदौरिया ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, प्राध्यापकों एवं विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कार्यक्रम का समापन किया। कार्यक्रम के दौरान डॉ. ओम शर्मा, डा. हरिप्रकाश मिश्र एवं सुश्री अरुणिका जैन का तकनीकी सहयोग रहा । सम्पूर्ण कार्यशाला का सफल संचालन विद्यार्थियों शिवम् यादव तथा रीता परमार द्वारा किया गया। इस अवसर पर महाविद्यालय के प्राध्यापकगण, शोधार्थी एवं बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे। कार्यशाला ने प्रतिभागियों को सतत विकास के लक्ष्यों और उनके विधिक पक्ष के प्रति जागरूक करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

