नर्मदापुरम / सुषमा और महेश (परिवर्तित नाम) का विवाह पाँच वर्ष पूर्व हुआ था। विवाह के उपरांत दोनों को एक प्यारी सी बेटी का सुख प्राप्त हुआ। प्रारंभिक समय सामान्य रूप से बीता, किंतु लगभग दो वर्ष पूर्व पारिवारिक जीवन में तनाव उत्पन्न हो गया। पति महेश की शराब पीने की आदत को लेकर पत्नी सुषमा ने आपत्ति की, जो धीरे-धीरे आपसी विवाद और झगड़ों का कारण बन गई। परिस्थितियाँ इतनी बिगड़ गईं कि सुषमा ने अपने तथा अपनी बेटी के भरण-पोषण हेतु परिवार न्यायालय नर्मदापुरम में आवेदन प्रस्तुत किया। वहीं दूसरी ओर महेश ने दांपत्य जीवन को पुनः स्थापित करने की मंशा से हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के अंतर्गत आवेदन दायर किया।
मामला लोक अदालत में पहुँचा, जहाँ परिवार न्यायालय के न्यायाधीश दीपक गुप्ता एवं लोक अदालत के सदस्यों द्वारा दोनों पक्षों को धैर्यपूर्वक समझाइश दी गई। इस प्रकरण में पत्नी की ओर से अधिवक्ता सुश्री सलोनी अग्रवाल तथा पति की ओर से अधिवक्ता संजीव अहिरवार ने प्रभावी एवं संतुलित पैरवी की। आपसी संवाद, समझ और भविष्य की जिम्मेदारियों पर विचार-विमर्श के बाद पति-पत्नी ने अपने मतभेद भुलाकर आपसी सहमति से राजीनामा कर लिया। राजीनामे के इस सकारात्मक क्षण को स्मरणीय बनाने के लिए न्यायाधीश दीपक गुप्ता द्वारा लोक अदालत में प्रदान किए गए पौधे को दोनों ने न्यायालय परिसर में रोपित किया। यह पौधा न केवल उनके नए जीवन की शुरुआत का प्रतीक बना, बल्कि यह संदेश भी दे गया कि रिश्तों को सहेजने से समाज में हरियाली और शांति आती है। लोक अदालत से निकलते समय सुषमा और महेश के चेहरों पर संतोष और विश्वास की मुस्कान थी। यह प्रकरण इस बात का जीवंत उदाहरण है कि संवाद, समझ और न्यायालय, अधिवक्ताओं की सकारात्मक भूमिका से टूटते परिवारों को फिर से जोड़ा जा सकता है।

