
नर्मदापुरम / एकनाथ द्वादशी (या वारकरी परंपरा में एकादशी-द्वादशी का व्रत प्रसंग) संत एकनाथ महाराज की भक्ति साधना और भगवत आराधना से जुड़ी तिथि है, जिसे वारकरी संप्रदाय में विशेष महत्व दिया जाता है। सामान्यतः यह ग्यारहवीं (एकादशी) और बारहवीं (द्वादशी) तिथि के पावन अनुष्ठान का हिस्सा है।
द्वादशी कब होती है?
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• तिथि: यह हिंदू पंचांग के अनुसार हर महीने आने वाली शुक्ल या कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को संदर्भित करती है, जो एकादशी व्रत के ठीक अगले दिन आती है।
• संत एकनाथ महाराज के संदर्भ में उनका मुख्य उत्सव नाथषष्ठी (फाल्गुन वद्य षष्ठी) के रूप में मनाया जाता है, जबकि द्वादशी तिथि भगवान विष्णु और हरिनाम संकीर्तन के समापन व पारण का दिन होती है।
द्वादशी की पौराणिक कथा (तुलसी महिमा)
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प्राचीन काल में शतानंद मुनि के ऋषियों और शिष्यों ने अपने गुरुदेव से प्रार्थना की कि वे ब्रह्मा जी के मुख से सुनी हुई ऐसी कथा सुनाएं जिससे मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाएं। तब शतानंद जी ने उन्हें द्वादशी और तुलसी माता की महिमा की यह कथा सुनाई:
एक बार देवलोक के वासी कामविकार में मग्न होकर नंदनवन में क्रीड़ा कर रहे थे। उनकी चंचलता और शोर के कारण वहाँ तपस्या में लीन रोमश ऋषि की समाधि भंग हो गई। क्रोधित होकर ऋषि ने उन्हें ‘ब्रह्मराक्षस’ हो जाने का श्राप दे दिया। जब उन्होंने भयभीत होकर क्षमा मांगी, तब दयालु ऋषि ने कहा, “जब तुम किसी पवित्र आत्मा के मुख से श्री हरि विष्णु और माता तुलसी की महिमा सुनोगे, तब तुम इस श्राप से मुक्त हो जाओगे।”
वे ब्रह्मराक्षस बनकर एक वृक्ष के कोटर में रहने लगे। एक बार कुछ तीर्थयात्री ब्राह्मण उस वृक्ष के पास से गुजर रहे थे और आपस में भगवान विष्णु के गुणों व द्वादशी के महत्व की चर्चा कर रहे थे। जैसे ही उन ब्रह्मराक्षसों के कानों में तुलसी जी और भगवान नारायण के नाम की ध्वनि पड़ी, वे तुरंत श्राप से मुक्त हो गए और दिव्य रूप धारण कर स्वर्ग लोक चले गए।
संत एकनाथ जी और द्वादशी का अद्भुत प्रसंग
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संत एकनाथ जी महाराज परम विष्णु भक्त थे। उनके जीवन चरित्र (श्री भक्तमाल) में द्वादशी से जुड़ी एक अत्यंत प्रसिद्ध कथा आती है:
एक बार जब संत एकनाथ जी अपने श्रद्धालुओं के साथ आलंदी की यात्रा पर थे, तब द्वादशी के पारण का दिन आया। सभी भक्तों को भोजन सामग्री (सीधा-सामान) की आवश्यकता थी, लेकिन उस निर्जन स्थान पर कोई दुकान नहीं थी।
तभी वहाँ अचानक एक लिंगायत (दुकानदार) आया, जिसके पास प्रचुर मात्रा में खाद्य सामग्री थी। उसने सभी भक्तों को उनकी आवश्यकता के अनुसार भोजन का सामान और पानी दिया। जब भक्तों ने पैसे देने चाहे, तो उसने पैसे लेने से मना कर दिया और कहा—”एकनाथ समर्थ हैं, मैं सारा हिसाब सीधे उन्हीं से समझ लूँगा।”
जब यात्रा आगे बढ़ी और एकनाथ जी ने उस दुकानदार को ढूंढकर हिसाब चुकता करना चाहा, तो वह दुकानदार अचानक अंतर्ध्यान (गायब) हो गया। तब एकनाथ जी को समझ आया कि उनके भक्तों को भूखा न रहने देने के लिए स्वयं भगवान पांडुरंग (श्री कृष्ण) भेष बदलकर आए थे। स्वयं एकनाथ जी ने अपने अभंगों में इस चमत्कारी घटना का वर्णन किया है।
महत्व और कथन
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• भक्ति और पारण: एकादशी के व्रत के बाद द्वादशी तिथि के दिन व्रत का पारण (भोजन ग्रहण करना) किया जाता है। संत एकनाथ ने अपने अभंगों में बताया है कि एकादशी का जागरण और हरि पूजन करने के बाद द्वादशी के दिन का प्रसाद व अनुष्ठान वैष्णव जनों के लिए अत्यंत आनंददायक होता है।
• आध्यात्मिक शुद्धि: इस दिन तुलसी पत्र, गंगाजल और भगवान को अर्पित नैवेद्य (प्रसाद) को ग्रहण करने से मन शांत होता है और सभी पाप नष्ट होते हैं।
• संयम का संदेश: यह तिथि हमें वासनाओं पर विजय पाने और भगवान विष्णु की शरण में निष्काम भाव से सेवा करने की प्रेरणा देती है।
• पापों का नाश: द्वादशी के दिन इस कथा को सुनने से अज्ञानता में किए गए सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।
• अक्षय पुण्य की प्राप्ति: मान्यता है कि जो व्यक्ति द्वादशी की रात्रि में जागरण कर भगवान विष्णु और तुलसी जी की महिमा सुनता है, उसके ३२ प्रकार के अपराध क्षमा हो जाते हैं और उसे गंगा स्नान के समान फल मिलता है। (संकलन – प्रीति चौहान)

