
नर्मदापुरम / पापांकुशा एकादशी आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एक पवित्र तिथि है, जिसमें भगवान विष्णु (पद्मनाभ रूप) की पूजा की जाती है। वर्ष 2026 में पापांकुशा एकादशी का व्रत 22 अक्टूबर 2026, गुरुवार को रखा जाएगा।
पापांकुशा एकादशी का अर्थ
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• पापांकुशा शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है—’पाप’ और ‘अंकुश’।
• इसका अर्थ है—पापों को नियंत्रित करने या रोकने वाला अंकुश।
• यह व्रत मनुष्य के जाने-अनजाने किए गए सभी पापों को नष्ट कर देता है।
पापांकुशा एकादशी का महत्व
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• पापों से मुक्ति: इस व्रत को करने से व्यक्ति को इस जन्म और पिछले जन्मों के पापों से छुटकारा मिलता है।
• मोक्ष प्राप्ति: महाभारतकाल में भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया था कि यह व्रत अंत में बैकुंठ धाम (विष्णु लोक) की प्राप्ति करवाता है।
• दान का फल: इस दिन स्वर्ण (सोना), तिल, भूमि, गौ, अन्न, जल, छतरी और जूतों का दान करने से यमराज के कष्टों का सामना नहीं करना पड़ता।
पौराणिक व्रत कथा और पाप क्षय की प्रक्रिया
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अज्ञानता और पाप कर्म: प्राचीन काल में विंध्याचल पर्वत पर क्रोधन (या महाक्रूर) नाम का एक अत्यंत क्रूर बहेलिया (शिकारी) रहता था। उसने अपना पूरा जीवन हिंसा, झूठ, लूटपाट और अधर्म के कामों में बिताया था, जिसके कारण उसके खाते में भयंकर पाप जमा हो चुके थे।
मृत्यु का भय और पश्चाताप: जब उसकी आयु समाप्त होने लगी और मृत्यु का समय निकट आया, तो यमराज ने अपने दूतों को उसे लाने का आदेश दिया। यमदूतों के भयानक रूप को देखकर बहेलिया अंदर से कांप उठा। उसे अपने किए गए बुरे कर्मों का अहसास हुआ और वह यमलोक की यातनाओं के डर से तड़प उठा।
संत की शरण में जाना: डर से व्याकुल होकर वह तुरंत महर्षि अंगिरा के आश्रम में जाकर उनके चरणों में गिर पड़ा। उसने रोते हुए प्रार्थना की, “हे ऋषिवर! मैंने जीवन भर केवल पाप किए हैं। कृपा करके मुझे कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे मैं यमराज के दंड से बच सकूं और मेरे पापों का नाश हो जाए।”
संकल्प और पापांकुशा एकादशी का व्रत: महर्षि अंगिरा ने उस पर दया करते हुए कहा कि यदि तुम आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पापांकुशा एकादशी का पूर्ण श्रद्धा, उपवास और भगवान विष्णु (पद्मनाभ रूप) की भक्ति के साथ करोगे, तो तुम्हारे जीवन भर के पाप नष्ट हो जाएंगे।
पापों का पूरी तरह नाश (क्षय): बहेलिए ने महर्षि के कहे अनुसार पूरी निष्ठा से एकादशी तिथि को अन्न का त्याग किया, भगवान का पूजन किया और रात में जागरण किया। इस एक व्रत के प्रभाव से उसके हृदय का शुद्धिकरण हुआ और उसके जीवन के समस्त भयंकर पाप जलकर भस्म हो गए। अंत समय में यमदूत उसे छू भी नहीं पाए और भगवान विष्णु के दूत उसे ससम्मान दिव्य विमान में बैठकर बैकुंठ लोक ले गए। (संकलन – प्रीति चौहान)

