

नर्मदापुरम / सिवनी मालवा में मालवांचल और बुंदेलखंड की मिलिजूली झलक हर त्यौहार में देखने को मिलती है। यह परम्परा यहां वर्षो से चली आ रही है। समय समय पर आने वाले इन त्यौहारो में श्राद्ध पक्ष में सांझा और दशहरे से शरद पूर्णिमा तक टेसू एवं करवा जैसे छोटे छोटे त्योहार शामिल है। जिनमे अभी सांझा का त्यौहार शुरु हो गैस है। जिसमे कुंवारी कन्याये अपने घरो की दीवारों पर शाम के समय रोजाना अलग अलग आकृतिया गोबर से बना कर मनभावन गीतों के साथ पूजन करके प्रसाद वितरण करती है। इन गीतों में सांझा तू थारे घर जा कि थारी बाई मारेगी कि पिटेगी, सांझा की गाडी लुढ़कती जाए जैसे मनभावन गीत मन मोह लेते है। कन्याएं इसी के साथ आपस में खेल खेलती रहती है। जिनमे अपने घरो से लाये प्रसाद के लिए एक दूसरे से पूछती है। इसके बाद पूजन करके प्रसाद वितरण किया जाता है। यह क्रम 16 दिनो तक चलता रहता है।
मालवांचल की लोक परंपरा है *सांझा*_____
मालवांचल की लोकसंस्कृति में ‘सांझ’ केवल दिन और रात के मिलन अर्थात संध्या यानी सांझा का समय नहीं, बल्कि लोकआस्था, पारिवारिक संस्कार और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का एक अनूठा प्रतीक है। ग्रामीण जीवन में संध्या के समय घर-आंगन की सफाई, दीप प्रज्वलन, तुलसी पूजन और लोकगीतों की परंपरा रही है। मालवा की लोकपरंपराओं में सांझ से जुड़ी एक विशेष परंपरा ‘सांझा’ या ‘सांझी’ के नाम से भी जानी जाती है। इसमें विशेषकर किशोरियाँ और बालिकाएँ दीवार पर गोबर से आकृतियाँ बनाकर उन्हें फूलों, पत्तियों और रंगों से सजाती हैं। यह परंपरा वर्षा ऋतु के बाद शरद ऋतु में, विशेष रूप से पितृपक्ष के दौरान, देखने को मिलती है। मालवा में इस परंपरा को सांझा, संजा, संज्या या संझा जैसे नामों से जाना जाता है। यह पितृपक्ष के दौरान मनाई जाने वाली एक पारंपरिक लोककला और लोकपर्व है। इसमें विशेष रूप से अविवाहित बालिकाएँ और युवतियाँ भाग लेती हैं।
सांझा बनाने की परंपरा______
इस लोकपरंपरा में प्रतिदिन संध्या के समय घर की दीवार पर गोबर से आकृतियाँ बनाई जाती हैं। फिर उन्हें फूलों, पत्तियों और रंगीन कागजों से सजाया जाता है। इसी का पूजन करके कन्याये आपस में खेल खेलकर अपना मनोरंजन करती है।
सांझा के लोकगीत____
सांझा की परंपरा में लोकगीतों का विशेष स्थान है। बालिकाएँ समूह में गीत गाती हैं। इन गीतों में संजा माता, पारिवारिक जीवन, विवाह, ससुराल और सामाजिक संबंधों की झलक मिलती है। इन गीतों में *सांझा तू थारे घर जा कि थारी बाई मारेगी कि पिटेगी*, *सांझा कि गाडी लुढ़कती जाए* जैसे लोकगीत शामिल है। इन गीतों के गाने के ढंग भी अलग अलग तरह के होते है। जो सुनने में बहुत सुहावने और मन को प्रफुल्लित करने वाले होते है जो अपनी लोक संस्कृति को जीवंत किये हुए है। इन गीतों के माध्यम से मालवा की स्थानीय बोली, भावनाएँ और पारिवारिक संस्कार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचते हैं। सांझा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि लोककला और सामूहिक सहभागिता की परंपरा भी है। यह लोककला प्रकृति के साथ जुड़ने का संदेश देती है। जिसमे गोबर, फूल-पत्तियों और प्राकृतिक रंगों से दीवारों को सजाने की कला को दर्शाया जाता है।
सांझा का समापन पर बनाती है किलाकोट____
पितृपक्ष के अंतिम दिनों में सांझा की आकृतियों को विशेष रूप से सजाया जाता है। अंतिम दिन बनी आकृति को कई स्थानों पर कन्याये ‘किलाकोट’ बनाती है। इसके बाद परंपरा के अनुसार आकृतियों का विसर्जन जलस्रोत में किया जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों में इस विधि में भिन्नताएँ मिलती हैं। सांझा मालवा की उस लोकसंस्कृति का प्रतीक है, जिसमें कला, गीत, आस्था और पारिवारिक जीवन एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। यह परंपरा हमें बताती है कि हमारी लोककलाएँ केवल मनोरंजन या पूजा का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक स्मृति और सांस्कृतिक पहचान की धरोहर हैं। मालवा की इस अनूठी परंपरा का दस्तावेजीकरण और नई पीढ़ी तक इसका परिचय पहुँचाना हमारी सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। हमे चाहिए कि हम सब मिलकर अपनी विलुप्त होती लोक संस्कृतियों को इन त्यौहारो के माध्यम से जीवित रखने में मिलकर आपना सहयोग कर प्रोत्साहन दे।

