नर्मदापुरम / तेजा दशमी राजस्थान और आसपास के राज्यों में मुख्य रूप से मनाया जाने वाला एक लोक पर्व है, जो प्रसिद्ध लोक देवता वीर तेजाजी महाराज को समर्पित है। यह त्योहार हर साल हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है।
तेजा दशमी का महत्व और मान्यताएं
=========================
लोक देवता वीर तेजाजी: वीर तेजाजी को राजस्थान में सत्यवादी, वचन के पक्के, गायों की रक्षा करने वाले और कृषक वर्ग के आराध्य लोक देवता के रूप में पूजा जाता है। उन्हें भगवान शिव का ग्यारहवां अवतार भी माना जाता है।
सर्प दंश से रक्षा: तेजाजी को ‘काला और बाला’ तथा सांपों के देवता के रूप में भी पूजा जाता है। ऐसी मान्यता है कि तेजाजी के नाम का स्मरण करने या उनके नाम का धागा (तंत) धारण करने से सर्प दंश (सांप के काटने) का जहर असर नहीं करता और व्यक्ति की रक्षा होती है।
कृषि उपकारक: इन्हें कृषि कार्यों और पशुधन का रक्षक देवता भी माना जाता है।
कैसे मनाया जाता है यह त्योहार?
====================
मेले का आयोजन: तेजा दशमी के दिन राजस्थान के कई स्थानों (विशेषकर नागौर जिले के परबतसर, सुरसुरा, खरनाल आदि) में वीर तेजाजी के विशाल मेलों और पशु मेलों का आयोजन होता है।
पूजा और जात: लोग इस दिन तेजाजी के थान (पवित्र स्थल) पर जाकर धोक लगाते हैं, व्रत रखते हैं और अपने मन्नत के धागे चढ़ाते हैं।
वीर तेजाजी महाराज की संपूर्ण और प्रामाणिक कथा
=================================
मुख्य रूप से वचन पालन, गौ-रक्षा और सत्य पर आधारित है। ग्रामीण अंचलों में गाए जाने वाले तेजाजी के प्राचीन भजनों और इतिहास के अनुसार उनकी मुख्य कथा इस प्रकार है:
1. ससुराल जाने का प्रसंगतेजाजी का विवाह बचपन में ही पनेर गाँव की पेमल से हो गया था, लेकिन बचपन के एक विवाद के कारण दोनों परिवारों में बोलचाल बंद थी और तेजाजी को अपने विवाह की बात पता नहीं थी।एक दिन खेत में काम करते समय उनकी भाभी ने ताना मारा कि “घर की औरतों से पहले खाना मांगते हो, अपनी पत्नी को क्यों नहीं ले आते?” यह सुनकर तेजाजी ने अपनी प्रिय घोड़ी लीलण को सजाया और माता-पिता के मना करने के बावजूद अपनी पत्नी पेमल को लाने ससुराल पनेर के लिए निकल पड़े।
2. ससुराल में स्वागत और लाछा गुर्जरी की भेंटजब तेजाजी पनेर पहुँचे, तो उस समय उनकी सासू माँ गाय दुह रही थीं। लीलण के पैरों की टाप से गायें बिदक गईं और दूध गिर गया। सासू माँ ने बिना देखे तेजाजी को अपशब्द कह दिए। स्वाभिमानी तेजाजी बिना अपनी पत्नी से मिले तुरंत वहाँ से वापस लौटने लगे। पेमल की सहेली लाछा गुर्जरी ने तेजाजी को रोका और उन्हें अपने घर ठहराया। उसी रात, मेर के मीणा डाकू लाछा गुर्जरी की गायें चुराकर ले गए। लाछा ने रोते हुए तेजाजी से मदद मांगी। वीर तेजाजी ने गायों को छुड़ाने की प्रतिज्ञा की और डाकुओं के पीछे निकल पड़े।
3. बासक नाग को वचन देनारास्ते में तेजाजी का सामना भाशंग (बासक) नाग से हुआ, जो अग्नि में जल रहा था। तेजाजी ने अपनी तलवार की नोक से उसे आग से बाहर निकाल दिया। लेकिन नाग देवता क्रोधित हो गए और बोले, “मैं मुक्ति की ओर जा रहा था, तुमने मुझे बचाकर मेरा रास्ता रोक दिया, अब मैं तुम्हें डसूंगा।”तेजाजी ने उनसे प्रार्थना की, “मैं लाछा गुर्जरी की गायें बचाने जा रहा हूँ। मैं वादा करता हूँ कि गायों को छुड़ाकर वापस तुम्हारे पास आऊँगा, तब तुम मुझे डस लेना।” नाग देवता ने उनके सत्य और वचनों पर विश्वास करके उन्हें जाने दिया।
4. भयंकर युद्ध और गायों की रक्षातेजाजी ने डाकुओं को घेर लिया और उनके बीच भयंकर युद्ध हुआ। अकेले तेजाजी ने सभी डाकुओं को परास्त कर दिया और लाछा की सभी गायें छुड़ा लीं। इस युद्ध में तेजाजी का पूरा शरीर घावों से लहूलुहान हो गया था।
5. वचन पालन और महाप्रयाणघायल अवस्था में भी तेजाजी अपना वचन निभाने के लिए वापस बासक नाग के पास पहुँचे। उनके पूरे शरीर से खून बह रहा था। नाग देवता ने कहा, “तुम्हारा पूरा शरीर घायल है, मैं कहाँ डसूँ? मेरे लिए कोई साफ जगह नहीं बची।”तब वीर तेजाजी ने मुस्कुराते हुए अपनी जीभ बाहर निकाल दी, क्योंकि केवल उनकी जीभ पर कोई घाव नहीं था। नाग देवता ने उनकी जीभ पर डसा और उन्हें आशीर्वाद दिया कि जो भी व्यक्ति सर्पदंश (सांप के काटने) पर तेजाजी के नाम का ताँती (धागा) बांधेगा, उस पर जहर का असर नहीं होगा।
सुरसुरा (किशनगढ़, अजमेर) नामक स्थान पर तेजाजी ने अपने प्राण त्यागे। उनकी वफादार घोड़ी लीलण ने दौड़कर उनके घर खरनाल यह दुखद समाचार पहुँचाया था। (संकलन – प्रीति चौहान)

