
नर्मदापुरम / जिले में गेहूं उपार्जन की प्रक्रिया कागजों पर तो सुचारू दिखाई दे रही है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके ठीक उलट है। कृषि उपज मंडी में बनाए गए केंद्रों पर तुलाई का कार्य जैसे-तैसे चल रहा है, लेकिन पूरी व्यवस्था अब अव्यवस्था की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। बिना आदेश निजी हाथों में तलाई की कमान मंडी में संचालित नर्मदा अंचल और रायपुर समिति में गेहूं उपार्जन के कार्य में गंभीर अनियमितता सामने आई है। इन दोनों समितियों में तलाई (तौल) का काम सरकारी कर्मियों के बजाय पूरी तरह प्राइवेट व्यक्तियों के हाथों में है। इन व्यक्तियों की पहचान और निवास का कोई रिकॉर्ड नहीं है। इन्हें किसने नियुक्त किया, किस अधिकारी के आदेश पर ये सरकारी कार्य देख रहे हैं और इन्हें कितना भुगतान किया जा रहा है, यह पूरी तरह जांच का विषय है। गौरतलब है कि जिले के अन्य केंद्रों जैसे डोलिया, सिवनी मालवा, सोहागपुर और पिपरिया में भी बिना जिला प्रशासन के आदेश के रोजाना मजदूरी करने वाले प्राइवेट व्यक्तियों को सरकारी काम में लगा दिया गया है। पिछले वर्ष इटारसी में तत्कालीन एसडीएम ने ऐसे ही एक मामले में प्राइवेट व्यक्ति पर एफआईआर दर्ज कराई थी, इसके बावजूद यह सिलसिला थमा नहीं है। परिवहन ठप, केंद्रों पर अनाज का अंबार उपार्जन केंद्रों पर अनाज की आवक तो निरंतर बनी हुई है, लेकिन परिवहन (ट्रांसपोर्टेशन) पूरी तरह चरमरा गया है। ट्रकों के अभाव में केंद्रों से अनाज का उठाव नहीं हो पा रहा है, जिससे मंडी परिसर में तिल रखने की जगह भी शेष नहीं बची है। तुलाई के बाद अनाज को सुरक्षित रखने के लिए न तो पर्याप्त जगह है और न ही सुरक्षात्मक व्यवस्था। परिवहन की इस सुस्त रफ़्तार के कारण किसान अपनी उपज के साथ कई दिनों तक केंद्रों पर ही डेरा डालने को मजबूर हैं। भीषण गर्मी में सुविधाओं का अभाव एक ओर शासन किसानों को उचित मूल्य देने का दावा कर रहा है, वहीं दूसरी ओर इन केंद्रों पर बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है। 40 डिग्री से ऊपर के तापमान और चिलचिलाती धूप के बीच किसान अपनी उपज की सुरक्षा को लेकर परेशान हैं। किसान अमन बानिया, हिमेश बानिया और राजेश किर ने अपनी व्यथा बताते हुए व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं। कर्मचारियों की व्यथा: पारिश्रमिक का ठिकाना नहीं ग्राउंड रिपोर्ट में उपार्जन कार्य में लगे कर्मचारियों का दर्द भी उभरकर सामने आया है। निजी कोटेशन पर रखे गए इन कर्मियों को सीजन आधा बीत जाने के बाद भी यह नहीं पता कि उन्हें कितना वेतन मिलेगा। कर्मियों का कहना है कि उन्हें उपार्जन समाप्त होने के बाद सरकार द्वारा तय रेट के आधार पर भुगतान किया जाता है, लेकिन वर्तमान में उनके पारिश्रमिक को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। पूरी उपार्जन व्यवस्था फिलहाल सवालों के घेरे में है और यदि समय रहते माल का उठाव सुनिश्चित नहीं किया गया, तो संकट और गहरा सकता है।

