


नर्मदापुरम / मध्यप्रदेश के महेश्वर और चंदेरी क्षेत्र की पारंपरिक साड़ियों के माध्यम से स्थानीय बुनकरों के रोजगार को मजबूत करने के लिए एक महत्वपूर्ण पहल की जा रही है। इस मुहिम का नेतृत्व इंदौर निवासी साड़ी कल्चर इंडिया संस्था की फाउंडर सुनीला दुबे कर रही हैं, जिनका उद्देश्य बुनकरों को उनकी कला का सही मूल्य और पहचान दिलाना है। सोमवार को कोरी घाट पर एक निजी होटल में हुई प्रेस कांन्फ्रेस में सुनीता दुबे ने बताया कि चूकिं मेरा मायका नर्मदापुरम का है, और मैं नर्मदापुरम के स्थानीय बुनकरों को उनकी असली पहचान दिलाना चाहती हूं। इस दौरान उन्होंने बताया कि महेश्वर घाट पर आयोजित एक प्रदर्शनी के जरिए बुनकरों की वास्तविक कारीगरी को सामने लाने का प्रयास किया था।
उनका कहना है कि वर्तमान में बाजार में मिलने वाली कई साड़ियों में पारंपरिक बुनाई की असली झलक नहीं दिखाई देती, जिससे सांस्कृतिक पहचान के साथ-साथ बुनकरों के रोजगार पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। उनका मानना है कि कई स्थानों पर लूम पर शुद्ध साड़ियों का निर्माण नहीं हो रहा है, जिसके कारण गुणवत्ता प्रभावित हो रही है और असली बुनकरों को पर्याप्त काम नहीं मिल पा रहा है। इस पहल के माध्यम से बुनकरों को पारंपरिक और उच्च गुणवत्ता वाली साड़ियां बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, ताकि उनके रोजगार के अवसर बढ़ सकें। इस मुहिम को और व्यापक बनाते हुए अब नर्मदापुरम के बुनकरों को भी इससे जोड़ने की तैयारी की जा रही है, जिससे अधिक से अधिक कारीगरों को रोजगार और पहचान मिल सके। सुनीता दुबे का मानना है कि यदि महिलाएं अधिक से अधिक साड़ियां पहनेंगी, तो इससे भारतीय संस्कृति को बढ़ावा मिलने के साथ-साथ स्थानीय बुनकरों की आय में भी वृद्धि होगी। इस अभियान में नेहा तिवारी और प्रिया तिवारी भी उनका सहयोग कर रही हैं। संस्था का उद्देश्य बुनकरों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाते हुए उनकी पारंपरिक कला को संरक्षित करना है।

