


नर्मदापुरम / मध्यप्रदेश ने नित नए नावाचार के साथ ये साबित कर दिया है कि परंपराओं को सहेजना और भविष्य की दिशा देना, दोनों एक साथ संभव है। 7 अगस्त राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर बात चंदेरी से महज 3-4 किलोमीटर दूर बसा प्राणपुर गांव की, जो भारत का पहला क्राफ्ट हैंडलूम टूरिज्म विलेज है, अब पूरे देश में मिसाल बन चुका है। यहां सदियों से करघों का जादू बसता है जो विश्वप्रसिद्ध चंदेरी साड़ियों को जन्म देता है और इसी सफलता से प्रेरित होकर अब मध्यप्रदेश टूरिज्म बोर्ड महेश्वर के पास केरियाखेड़ी में महेश्वरी बुनाई और धार जिले के कुक्षी में बाग प्रिंट को केंद्र में रखकर नए क्राफ्ट हैंडलूम विलेज विकसित कर रहा है। यही वजह है कि जहां देश के कुछ राज्यों में अभी सिर्फ एक क्राफ्ट विलेज है, वहीं मध्यप्रदेश अकेला ऐसा राज्य बनने जा रहा है जिसके पास तीन क्राफ्ट विलेज होंगे, इस मॉडल की गूंज इतनी दूर तक पहुंची कि केंद्रीय वस्त्र मंत्रालय ने इसकी सराहना करते हुए अन्य राज्यों को भी इसे अपनाने की सलाह दी है। साल 2024 में पर्यटन मंत्रालय ने प्राणपुर को बेस्ट टूरिज्म विलेज अवार्ड से सम्मानित किया, एक ऐसा सम्मान जो हजारों बुनकरों की मेहनत और विरासत को समर्पित है।
प्रदेश अपनी समृद्ध हथकरघा परंपरा और बुनकर समुदाय को सशक्त बनाने की दिशा में किए जा रहे प्रयासों के कारण एक विशिष्ट पहचान बना रहा है। यही ज़िम्मेदार पर्यटन की बुनियादी शर्त भी है, आर्थिक लाभ स्थानीय समुदाय के बीच रहे, विकास की गति गाँव की सामाजिक संरचना पर बोझ न बने और कहानी के केंद्र में उत्पाद नहीं बल्कि उसे बनाने वाला व्यक्ति रहे।
वहीं धार जिले के कुक्षी में प्रस्तावित क्राफ्ट हैंडलूम टूरिज्म विलेज बाग प्रिंट की प्रसिद्ध पारंपरिक कला को पर्यटन से जोड़ेगा। यह पहल शिल्पकारों की आजीविका को सशक्त बनाने, इस विरासत को संरक्षित करने तथा पर्यटकों को बाग प्रिंट की प्रक्रिया को करीब से देखने और स्थानीय कारीगरों से सीधे हस्तनिर्मित उत्पाद खरीदने का अवसर प्रदान करेगी।
सैकड़ों परिवार हो रहे आत्मनिर्भर…
चंदेरी और महेश्वर की बुनाई परंपरा आज भी राज्य की सांस्कृतिक विरासत के साथ-साथ हजारों परिवारों की आजीविका का आधार है। चंदेरी के प्राणपुर में लगभग 450 बुनकर परिवार पीढ़ियों से पिट लूम पर चंदेरी वस्त्र बुनते आ रहे हैं। वहीं महेश्वर के केरियाखेड़ी में 60-70 परिवार के 125 बुनकरों को हथकरघा उद्योग रोजगार उपलब्ध कराता है। सूत तैयार करने, रंगाई, बुनाई, डिजाइनिंग और फिनिशिंग जैसे विभिन्न कार्यों में महिलाओं की सक्रिय भूमिका इस उद्योग को सामाजिक और आर्थिक रूप से मजबूत बनाती है।
आर्थिक रूप से समृद्ध होगा महेश्वर….
महेश्वर अब धार्मिक पर्यटन के साथ टेक्सटाइल टूरिज्म के नए केंद्र के रूप में विकसित हो रहा है। मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग और वस्त्र मंत्रालय के सहयोग से 5.11 करोड़ रुपये की लागत से टेक्सटाइल विलेज बनाया जा रहा है। यहां विश्व प्रसिद्ध माहेश्वरी साड़ी की बुनाई कला को बढ़ावा देने के साथ ग्रामीण पर्यटन और बुनकरों की आय बढ़ाने पर जोर है। गांव में 10 होम-स्टे, आधुनिक कैफेटेरिया, ट्रैकिंग मार्ग और घाट विकास जैसे कार्य किए जा रहे हैं। करीब 125 हैंडलूम वाले इस गांव में पर्यटक बुनाई प्रक्रिया देख सकेंगे और सीधे बुनकरों से उत्पाद खरीद सकेंगे। यह परियोजना महेश्वर की सांस्कृतिक पहचान को नई ऊंचाई देगी।
बुनकरों को मिली बिचौलियों से आजादी….
चंदेरी और महेश्वर के स्थानीय बाजार आज केवल व्यापारिक केंद्र नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पर्यटन के महत्वपूर्ण आकर्षण भी बन चुके हैं। देश-विदेश से आने वाले पर्यटक सीधे बुनकरों, सहकारी समितियों और शिल्प केंद्रों से वस्त्र खरीदते हैं। इससे बुनकरों को बेहतर मूल्य प्राप्त होता है, बिचौलियों पर निर्भरता कम होती है और स्थानीय अर्थव्यवस्था को सीधा लाभ मिलता है। यह पर्यटन-आधारित विपणन मॉडल हस्तनिर्मित उत्पादों को नई पहचान देकर ‘वोकल फॉर लोकल’ के सिद्धांत को साकार कर रहा है।
कला को मिली वैश्विक पहचान….
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर मध्यप्रदेश का यह प्रयास इस बात का उदाहरण है कि हथकरघा केवल वस्त्र निर्माण की कला नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सतत विकास का मजबूत आधार है। पर्यटन और परंपरा का यह संगम बुनकर समुदाय को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के साथ-साथ राज्य की समृद्ध शिल्प विरासत को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

