
नर्मदापुरम / श्री राम मंदिर ग्राम दतवासा तहसील डोलरिया में चल रही श्री शिव महा पुराण के पंचम दिवस में डॉ. पुष्कर परसाई ने बताया भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह प्रसंग का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने बताया कि यह विवाह केवल दो दिव्य आत्माओं का मिलन नहीं, बल्कि प्रेम, भक्ति और शक्ति का सर्वोच्च संगम था। आचार्य श्री ने कथा के दौरान बताया कि माता पार्वती पूर्व जन्म में सती के रूप में भगवान शिव की अर्धांगिनी थीं। पुनर्जन्म लेकर वे हिमालय राज के घर पार्वती रूप में अवतरित हुईं, जिसके बाद उनके हृदय में शिव के प्रति वही अटूट प्रेम पुनः जागृत हो उठा। माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए वर्षों तक कठोर तपस्या की। इस दौरान उन्होंने शीत, वर्षा, धूप और एकांत जैसी कठिन परीक्षाओं का सामना किया, लेकिन उनका निश्चय नहीं डिगा। उनकी तपस्या केवल इच्छा नहीं थी, बल्कि शिव को समझने, उनमें लीन होने और शिव तत्व को आत्मसात करने की साधना थी। आचार्य श्री ने आगे बताया कि भगवान शिव ने पार्वती की तपस्या की परीक्षा लेने के लिए सप्तऋषियों को भेजा। ऋषियों ने शिव के वैराग्य, भस्म, जटाओं और गले में सर्प जैसे औघड़ रूप का वर्णन करते हुए समझाया कि शिव सामान्य सांसारिक जीवन से परे हैं। हालांकि, पार्वती का उत्तर अडिग था कि उन्हें रूप नहीं, तत्व चाहिए; संसार नहीं, शिव चाहिए। उनकी इस दृढ़ भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने स्वयं प्रकट होकर उन्हें अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार करने का वचन दिया। विवाह का शुभ दिन आने पर कैलाश से भगवान शिव की बारात अद्भुत स्वरूप में निकली। इसमें नंदी, भूतगण, शिवगण, डमरू और शंख की अलौकिक ध्वनियों ने ब्रह्मांड को आनंदित कर दिया। हिमालय के आंगन में विवाह मंडप सजाया गया, जहाँ ब्रह्मा ने विवाह मंत्रों का उच्चारण किया और भगवान विष्णु ने कन्यादान का साक्षी भाव निभाया। समस्त देवगणों ने पुष्प वर्षा कर इस पवित्र मिलन को आशीर्वाद दिया। कथा का समय 1.30 बजे से 4.30 तक है । आयोजक रिछारिया परिवार ने सभी से कथा में पधारने का आग्रह किया।

