
सोहागपुर / जब कोई परेशान हो जाता है तो वह उस परेशानी से निजात पाने के लिए कोई ना कोई कदम उठाता है। हम बात कर रहे है एक गरीब परिवार की जो कड़ाके की ठंड में सड़क पर परिवार सहित बैठा है। SDM कार्यालय के ठीक सामने भूख हड़ताल पर बैठे द्वारका प्रसाद कहार अपने साथ मासूम बच्चों को लेकर बैठे हैं—वे बच्चे, जिनकी जगह इस मौसम में रजाई के अंदर होनी चाहिए थी, न कि ठंडी ज़मीन पर। बिजली विभाग की तानाशाही और कथित मनमानी ने इंसानियत की सारी सीमाएं तोड़ दीं। जिस मीटर को खुद विभाग ने खराब मानकर बदला, उसी मीटर का ₹13,352 का बिल गरीब उपभोक्ता पर थोप दिया गया। विरोध करने और जांच की मांग करने की सज़ा यह मिली कि घर की बिजली काट दी गई। न सुनवाई, न जांच, न कोई जवाब—सिर्फ दबाव और धमकी।
*भूख, ठंड और अंधेरे के बीच बैठे मासूम बच्चों की आंखों में सिर्फ एक ही सवाल है*
क्या हमारी गलती यह है कि हम गरीब हैं? यह दृश्य केवल बिजली विभाग ही नहीं, पूरे प्रशासन के लिए एक काला अध्याय है। SDM कार्यालय के सामने ठिठुरते बच्चे और बेबस माता-पिता सिस्टम के मुंह पर करारा तमाचा हैं। अगर आज भी अफसरों की नींद नहीं टूटती, तो यह मान लिया जाए कि यहां फाइलों की कीमत ज़िंदगियों से ज़्यादा है। अब सवाल सिर्फ बिजली का नहीं, सिस्टम की संवेदनहीनता का है। क्या प्रशासन जागेगा, या मासूमों की यह ठंड भी सरकारी फाइलों में दफन कर दी जाएगी ? हम यह मानते हैं कि बिजली आज हर घर की आवश्यकता बनी हुई है और एक भी दिन घर में बिजली नहीं रहे तो जीवन अस्तित्व हो जाता है। इस पीड़ित परिवार की समस्या को प्रशासनिक अधिकारी एवं जनप्रतिनिधियों को आगे आकर सुलझाना होगा।

