
नर्मदापुरम / सिवनी मालवा में दशहरा पर्व से छोटे-छोटे बच्चों द्वारा टेसू और छोटी-छोटी बालिकाओं द्वारा घरवा लेकर घर-घर जाकर दान मांगने की परंपरा शुरू हो गई है। यह टेसू और घरवा का उत्सव दशहरे से शरद पूर्णिमा तक चलता रहता है।
छोटे बच्चे पुस्टे से छोटा तिकोना घर बनाकर उसे पन्नियों से सजाते हैं। उसके अंदर एक दिया और आटे का डरावना पुतला रखते हैं। घर-घर जाकर टेसू के गीत –
*मेरा टेसू यहीं खड़ा, खाने को मांगे दही बड़ा, टेसू अच्छा होता तो बहू लाते, बहू अच्छी होती तो ऊंट पर बैठाते*
जैसे गीत गाकर छल्ला-बोली का दान मांगते हैं।
वहीं बालिकाएं घरवा जो एक मिट्टी के छोटे घड़े में चारों तरफ छेद करके उसके अंदर दीपक रखकर बनाया जाता है, उसे लेकर गीत –
*सिंगाजी घरवा गाजो जी, माय थारे घर मुरली बाजे*
जैसे आशीर्वाद के गीत गाकर दान मांगती हैं। यहां यह उत्सव टेसू और घरवा के रूप में मनाया जाता है।
शरद पूर्णिमा के दिन टेसू को लकड़ियों से पीट-पीटकर नष्ट कर दिया जाता है। दान में मिली राशि से टेसू बनाने वाले बच्चे दाल-बाटी, चूरमा बनाकर उसका आनंद लेते हैं। वहीं बालिकाएं भी घरवा के मिट्टी के कलश को नदी में प्रवाहित कर देती हैं और दान राशि से भोजन बनवाकर आनंद उठाती हैं।
सभी ने अपने बचपन में इस उत्सव को मित्रों के साथ मनाया है। विजयादशमी के दिन एक लकड़ी का पुतला बनाते थे, उसका चेहरा थोड़ा डरावना रखते थे। उसे पुराने कपड़े पहनाकर, उसके मुंह में बीड़ी फंसाकर, सिर पर जलता हुआ दीपक रख देते थे। विजयादशमी से शरद पूर्णिमा तक शाम के समय मोहल्ले में घर-घर जाकर, उसे सामने खड़ा करके गीत गाते थे और हर घर से गेहूं, चावल, अरहर की दाल, शुद्ध घी या कुछ नगद पैसे, जो भी मिले, ले आते थे। शरद पूर्णिमा की शाम अंतिम दिन सभी घर जाकर उस पुतले यानि टेसू को लाठियों से पीटकर तोड़ देते थे तथा आग लगाकर जला देते थे।
लुप्त होती जा रही प्रथा…
अलग-अलग जगह टेसू की अलग-अलग कहानियां और परंपराएं हैं। ब्रज में एक वक्त था जब दशहरे पर रावण दहन से ज्यादा टेसू और सांझी को घर लाकर उनका विवाह कराने की बच्चों में होड़ रहती थी। बच्चे हाथों में टेसू लेकर घर-घर जाकर गीत गाते थे। इसके बाद हर घर उन्हें अनाज या धन देकर विदा करता था, जिसे बच्चे टेसू और सांझी के विवाह में लगाते थे। आखिरी में पूर्णिमा के दिन धूमधाम से उनका विसर्जन किया जाता था।
आमतौर पर टेसू का स्टैंड बांस का बनाया जाता है। इसमें मिट्टी की तीन पुतलियां फिट की जाती हैं, जो क्रमशः टेसू राजा, दासी और चौकीदार की होती हैं। बीच में मोमबत्ती या दिया रखने की जगह बनाई जाती है।
यूं तो टेसू की धूम सारे उत्तर भारत में रहती थी, लेकिन ब्रज, बुंदेलखंड और ग्वालियर में टेसू खास तौर पर प्रसिद्ध है। धीरे-धीरे यह अनोखी प्रथा अब गुमनाम होती जा रही है और इसे गाते समय गाए जाने वाले गीत भी लोगों को ठीक से याद नहीं हैं

