
इटारसी / नर्मदांचल की आस्था के प्रतीक ‘संत शिरोमणि रामजी बाबा मेला 2026’ में इस बार व्यवस्थाओं की चकाचौंध तो है, लेकिन मानवीय संवेदनाओं का अभाव खटक रहा है। मेले की नई ‘आउटसोर्सिंग’ और ठेका प्रणाली ने न केवल स्थानीय कलाकारों के हक पर डाका डाला है, बल्कि वर्षों से अपनी कला के जरिए जीविकोपार्जन करने वाले दिव्यांग कलाकारों को भी हाशिए पर धकेल दिया है।
जीविका पर संकट: मंच से दूर किए गए भजन सम्राट…..
इस पूरे विवाद का सबसे दुखद पहलू प्रख्यात भजन गायक आलोक शुक्ला की अनदेखी है। आलोक शारीरिक रूप से दिव्यांग हैं, लेकिन उनकी आवाज और भक्ति में जो बल है, उसने पिछले 32 वर्षों से मां जगदंबा की स्तुति के माध्यम से नर्मदापुरम की सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखा है। हैरानी की बात यह है कि आलोक शुक्ला का पूरा परिवार और उनका भरण-पोषण इसी संगीत साधना और सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से होता है। प्रशासन द्वारा उन्हें इस बार मंच न देना, एक कलाकार की जीविका छीनने जैसा है।
नगर पालिका और प्रबंधन की मिलीभगत का आरोप……
इस मामले में स्थानीय स्तर पर गहरा असंतोष है। चर्चा है कि नगर पालिका अधिकारियों और मेला प्रबंधन की कथित मिलीभगत के कारण ही एक समर्पित कलाकार की इस तरह उपेक्षा हुई है। सांठगांठ के चलते निजी हितों को साधने के चक्कर में परंपरा और योग्यता को ताक पर रख दिया गया है।
सिर्फ प्रचार के लिए याद आते हैं स्थानीय कलाकार?……
‘माँ के बेटे’ जागरण समिति और स्थानीय कलाकारों में भारी आक्रोश है। उनका कहना है कि जब प्रशासन को ‘बेटी बचाओ’ या ‘मतदान जागरूकता’ जैसे सरकारी अभियानों के लिए मुफ्त में प्रचार की जरूरत होती है, तब आलोक जैसे दिव्यांग कलाकारों की सेवा ली जाती है। परंतु, जब रामजी बाबा मेले जैसे बड़े आयोजनों में सम्मानजनक पारिश्रमिक देने की बारी आई, तो प्रशासन ने ‘टेंडर’ और ‘बाहरी इवेंट कंपनियों’ का हवाला देकर उन्हें किनारे कर दिया।
* सीधा संवाद खत्म: इवेंट ठेकेदारों के आने से प्रशासन और स्थानीय कलाकारों के बीच का सीधा जुड़ाव टूट गया है।
* आवेदन की अनदेखी: स्थानीय समूहों का आरोप है कि उनके आवेदनों पर विचार तक नहीं किया गया।
* संवेदना शून्य नीति: क्या एक दिव्यांग कलाकार, जो दशकों से मेले की परंपरा का हिस्सा रहा है, उसे केवल एक ‘टेंडर’ और ‘अधिकारियों की मनमानी’ के कारण बाहर करना उचित है?

